*अलीराजपुर~ आदिवासी समाज का परंपरागत होली पूर्व हाट है भोंगर्या*~~

*असल मे आदिवासी संस्कृति क्या है जानिये आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता की कलम से*~~

*नितेश अलावा सामाजिक कार्यकर्ता अलीराजपुर*~~,

जुबेर निज़ामी की रिपोर्ट✍
अलीराजपुर📲9993116518~~


अलीराजपुर अगले महीने से आदिवासी समाज मे प्रख्यात होली पूर्व हाट-बाजार भगौरिया प्रारम्भ होने वाले है,
वर्तमान मिडीया ओर आदिवासी समाज की अज्ञानता के चलते इसे कही प्रकार से दुष्प्रचारित कर कही नाम दिए गए जैसे-आदिवासियो का वैलेंटाइन डे,लड़का-लड़की एक दूसरे को गुलाल लगाकर राजी होते है,तो पान खिलाकर भगा ले जाना आदि झूठे प्रचार कर प्रकृति के करीब अंजान आदिवासी समाज का राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय स्तर पर मजाक उड़ाया गया।
इस तरह की अफवाहों के चलते देश-विदेश का मीडिया इन आदिवासी छेत्रो में भोंगरिया के समय आता है,कही लेखक,निर्देशक आकर इसे जानते भी है लेकिन उन तक आज तक सही जानकारी नही पहुच पाई जिसकी वजह से आदिवासी समाज की लड़कियां खतरे में आगयी है,
पिछले 5 सालों का आंकड़ा बताये तो ग्रामीणों अनुसार करीब 1200 नाबालिक,सेकड़ो 15-25 साल की लडकिया लापता है।
ये अलग अलग गाँव मे जाकर पूछने पर बताये गए आंकड़े है।

लोगो को लगता है के वो भाग गई जबकि असल मे उसके साथ घटना कुछ और ही होती है।
विश्व प्रसिद्ध भगौरिया वालपुर निवासीयो अनुसार पहले गाँव की लड़कियां सुरक्षित महसूस करती थी लेकिन वर्तमान स्थिति वैसी नही है अब छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ गयी है,अखबारों ओर मीडिया में भी गलत प्रचार कर बाहरी लोगों को यहां आने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिसकी वजह से बाहरी लोग इसे मनोरंजन के लिए सही जगह समझने लगे है।
इसको लेकर मध्यप्रदेश सरकार के टूरिज्म विभाग द्वारा भी केम्प लगाया जाता रहा है किंतु पिछले 2 सालों से बन्द हो गया।
छेड़छानी की घटना से निपटने के लिये पिछले 2-3 सालो में पुलिस प्रशासन ने सख्ती दिखाई है।
*वास्तव मे भगोरिया होली के पूर्व का हाट-बाजार होता है जिसमे खरीफ,रबी की फसल के बाद पूरी तरह से फ्री होकर आदिवासी समाज के लोग होली की तैयारी हेतु बाजार आते है चूंकि वर्षो पहले आदिवासी छेत्रो में संचार ओर यातायात का कोई साधन नही था,दूर दूर रहने वाले दोस्त,रिश्तेदार महीनों नही मिल पाते थे वहीं आदिवासी परम्परा में होली का डांडा गढ़ जाने के दौरान कोई शुभ कार्य नही होता है हा इस दौरान लड़का-लड़की(वर-वधु) देखने का काम चलता है चूंकि आदिवासीयो की निशानी ही रही है शर्मीलापन,बाहरी नए लोगों से न घुलना-मिलना,इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए बड़े-बुजुर्गों ने ये परम्परा चालू की के इस हाट-बाजार में इसी बहाने ये सारे काम हो जाते रहे है इस दौरान बड़े-बच्चे,महिलाएं अपनी पारम्परिक वेशभूषा में सज धजकर आते है सभी लोग शामिल होकर इस मेले रूपी हाट को उत्सव के रूपमे मनाते है और हाट होली जलाने ओर घर के लिए करके ढलती शाम लौटते है।वर्तमान मीडिया इसे भगौरिया के रूप में प्रचारित करता है जबकि इसका वास्तविक नाम भोंगर्या है आज भी गाँव मे इसे भोंगर्या ही कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ-हल्ला-गुल्ला (आदिवासी में) है।*
*देश-दुनिया मे प्रख्यात आदिवासी संस्कृति,परम्परा की झलक इस विशाल हाट-बाजार में देखने को मिलती है जहा ढोल-मांदल,पावली(बासुरी)जैसे वाद्य यंत्र के साथ देशी दारू-ताड़ी की छाक के साथ सम्पूर्ण आदिवासी समाज एक रंग में रंगता हुआ दिखाई देता है जहां सारे गीले-शिकवे दूर कर राम-राम कर,वारु-छारु, वारु की(मतलब हाल-चला जनाना) एक दूसरे का अभिवादन करते है जहाँ उनकी एकता भी नजर आती है।*
ये एक परम्परागत हाट है जो वर्तमान में त्योहार का रूप ले चुका है लेकिन मीडिया में इसे पर्व के रूपमे प्रकाशित किया जाता है जो पूरी तरह गलत है।
इस मिथक को तोड़ने की अपील करते हुए मीडिया वाले बंधुओ से आदिवासी समाज अनुरोध करता है के आप इस जिले के मूलनिवासी हो आप भी इसे अच्छी तरह जानते हो इसलिए भ्रामक जानकारी न फैलाते हुए आदिवासी शब्दों का प्रयोग करे,वनवासी जैसे शब्दों से समाज की भावना आहत होती है आप इसे भगौरिया की जगह भोंगर्या लिखे ओर वेलेन्टाइन डे तो बिल्कुल न लिखे।
पिछले कुछ सालों में देखा गया है के भोंगरिया हाट में पार्टी के कही  दल अपनी गैर ढोल के साथ शामिल होते है जिससे अलग ही उत्साह देखने को मिलता है लेकिन पीछले कुछ समय से इस सामाजिक हाट को राजनैतिक अखाड़ा बनाया जा रहा हैं जिसमे पार्टी दल अपने पार्टी के झंडे लेकर आने लगे है जिससे समाज मे विपरीत प्रभाव पड़ रहा है समाज के लोग आपस मे मिलने जुलने से कतराने लगे है ऐसी स्थिति निर्मित न करते हुए
*आदिवासी संस्कृति, परम्परा को बचाने के लिए समाज के जनप्रतिनिधियों को आगे आने ओर नव युवाओ से भी अपील की है।*
क्योंकि समाज का आधार संस्कृति ही है बिना संस्कृति,परम्परा के समाज संचालित नही हो सकता है और आदिवासी संस्कृति,परम्परा विश्व की धरोहर है इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ही 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की परिकल्पना कर घोषित किया गया था।


Post A Comment:

1 comments: