*अलीराजपुर~ जिले मे कुपोषण के आकड़े प्रति वर्ष बड़ते  ही जा रहे है।*~~

*शासन की योजनाऔ का नही मिल रहा है लाभ*~~

*कुपोषित बचचों की संख्या में हो रहा है प्रति वर्ष इजाफा*~~

✍जुबेर निज़ामी की रिपोर्ट✍
अलीराजपुर 📲9993116518~~


अलीराजपुर जिले में कुपोषण की तस्वीर भयावह हो चली है। तमाम कोशिशों के बाद भी कुपोषित बच्चों की तादाद कम नहीं हो रही है। एनसीआर के आकडो के हिसाब से इस वर्ष की अप्रैल 2016 से मार्च 2017 मे 415 बच्चे वही अप्रैल 2017 से मार्च 2018 मे 476 बच्चे दर्ज किये गये है। इस हिसाब से 61 बच्चो की बढ़ोतरी हुई है यानी सर्वे रिपोर्ट में कुपोषण की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।  जबकी अप्रैल 2019 से मई यानी एक माह मे 56 बच्चे कुपोषित पाये गये। यदि हम एक माह के इस आकड़े के हिसाब से कैलकुलेशन करे तो इस वर्ष तकरीबन 672 कुपोषित  बच्चे हो सकते है यानी फिर बडोतरी।

मातृ एवं शिशु मृत्यु दर पर नियंत्रण और कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं को धरातल पर उतारने और कारगर बनाने की जिम्मेदारी बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग और स्वास्थ्य विभाग के कंधों पर है। गर्भवती महिलाओं, धात्री महिलाओं और शिशुओं की जांच, टीकाकरण और पोषण के नाम पर करोड़ों रुपये सरकार इन विभागों को भेजती है। धनराशि की बंदरबांट और प्रशासन की लापरवाही के चलते कुपोषण पर नियंत्रण की कवायद बेकार साबित हो रही है। 
मार्च 2019 में बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से कराए गए सर्वे में कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। इससे सरकार की ओर से चलाई जा रहीं योजनाओं पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। बच्चों की न तो नियमित जांच हो रही और न उन्हें पोषाहार मिल पा रहा। यही वजह है कि  कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ गई है।

इसमें लाल श्रेणी यानी अति कुपोषित की संख्या  और पीली श्रेणी यानी कुपोषित की संख्या  है। 

👉पोषण पुनर्वास केंद्र नहीं पहुंच पाते बच्चे 
अलीराजपुर कुपोषण से जूझ रहे बच्चों को उपचार के लिए जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र खोला गया है, लेकिन कुपोषित बच्चों को पहुंचाने में आंगनबाड़ी केंद्र उदासीन बने हैं। एक साल में आए 456 बच्चों आऐ

👉कुपोषित बच्चों को सामान्य बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। बच्चों और धात्रियों को पोषाहार, दवाओं के माध्यम से आयरन आदि कमी होने से रोका जाता है। कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आ रही है। 

*गंभीर कुपोषितों को भूले जिम्मेदार फॉलोअप कराने में हो रही अनदेखी*

कुपोषित बच्चों को चिन्हांकित करके उनका पोषण करने के लिए एनआरसी पर लाया तो जाता है, लेकिन यहां से छृट्टी होने के बाद इन बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देता। जिला अस्पताल के एनआरसी में इस बार रिकॉर्ड तोड़ 456 कुपोषित बच्चे भर्ती कराए गए। उनमें से 50 फीसदी ऐसे हैं जिनको 15 दिन बाद पहलीबार भी फॉलोअप के लिए नहीं लाया गया। यही स्थिति है जिसके कारण इन कुपोषितों की हालत में सुधार नहीं हो पा रहा है। जबकि जिला अस्पताल प्रबंधन एनआरसी में आ चुके कुपोषितों का तय डेट पर फॉलोअप कराने के लिए महिला बाल विकास विभाग को सूचित कर चुका है इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्र से इन कुपोषितों को फॉलोअप के लिए एनआरसी तक नहीं लाया जा सका है। पिछले चार माह के दौरान जिला अस्पताल एनआरसी में लगभग 456 कुपोषित बच्चों को लाया जा चुका है जिनमें कई बच्चे ऐसे हैं जो यहां आने के बाद फॉलोअप तक के लिए भी नहीं आए।

👉लाने के मिलते हैं रुपए, फिर भी लापरवाही
कुपोषित बच्चों को चयनित करके या पहले लाए गए कुपोषितों को फॉलोअप के लिए एनआरसी तक लाने की जिम्मेदारी आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की है। इन कार्यकर्ताओं को सरकार बच्चों को लाने ले जाने पर पैसा भी दे रही है। इसके बाद भी इन कुपोषितों के प्रति अनदेखी की जा रही है।

👉हर कुपोषित पर हो रहे 4 हजार 460 रुपए खर्च
कुपोषित बच्चे को स्वस्थ्य करने के लिए सरकार हर बच्चे पर लगभग 4 हजार 460 रुपए 02 माह में खर्च कर रह रही है। बच्चे की मां को एनआरसी में 14 दिन रहकर इलाज कराने पर 1780 रुपए मजदूरी के रूप में दिए जाते हैं। इसके बाद 4 फॉलोअप कराने पर 880 रुपए और कुपोषितों को एनआरसी लाने वालों के लिए 200 रुपए पर फॉलोअप के रूप में तय किया गया है।इसके बाद भी जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारी या कार्यकर्ताएं इन कुपोषितों को लेकर गंभीर नही है। जब एनआरसी में दो या ढाई महीने बाद कुपोषितों को लाया जाता है तो इन बच्चों को फिर नए सिरे से एडमिट करना पड़ता है।


Post A Comment:

0 comments: