बड़वानी~नर्मदा नदी, प्रकृति, संस्कृति बरबाद न होने दे शासन और समाज!~~

राजघाट पर 7 अगस्त सत्याग्रह! डूब के पहले संपूर्ण पुनर्वास का आग्रह~~



   नर्मदा बचाओ- मानव बचाओ के नारे के साथ सवाल उठाये, जवाब मांगे और विकास चाहिये लेकिन विनाश नहीं, यह कहते हुए अब 34 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन आज भी नर्मदा किनारे के सैकड़ों गांवों का, हजारों परिवारों का ही नहीं, पर्यावरण का भी सवाल बाकी है-सुरक्षा का!

    आज भी सरदार सरोवर के ही 214 किमी लम्बाई के क्षेत्र में लाखों लोग बसे है........और एकेक ही पहचान, पात्रता, पुनर्वास की स्थिति की जाँच-परख जारी है। राजघाट (जिला-बड़वानी) जैसे तीर्थ क्षेत्र में ही बसे है, 150 परिवार तो निसरपुर (जि.धार) में 2000 परिवार! कुल 192 गांव और धरमपुरी नगर भी प्रभावित क्षेत्र के नाते, अपने हजारों घर, खेत-खलिहान पर हक खोते हुए, कानूनन भू-अर्जित होकर वंचित किये जाते रहे... अपने-अपने आजीविका ही नहीं तो जीवन से! इसके सामने अहिंसक, सत्याग्रही संघर्ष ने बहुत कुछ पाया लेकिन शासनकर्ताओं की असंवेदना, संवादहीनता और गैरकानूनी ही क्या, अन्यायपूर्ण निर्णयों का सिलसिला झेलते हुए ही लड़ना पड़ा, किसान-मजदूरों को, मछुआरे, कुम्हार,केवट व्यापारियों को! हर समुदाय के लिए हमने हक मंजूर करवाया लेकिन उसका पालन पूरा नहीं हो पाया! भ्रष्टाचारी दलाल-अधिकारी गठजोड़ने एक ओर गरीबों को लूटा तो दूसरी और गलत सूचियाँ, कागजात बनाकर भले-भले को फंसा दिया।

           मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात के डूब क्षेत्र के 32000 से अधिक परिवार जब कि अपना हक लिए बिना आ रही डूब को चुनौती दे रहे है, तब वे जानते है कि अब बांध पूरा होकर गेटस बंद है। लेकिन जहाँ गांव-गांव के लोग डटे है, अर्जियां प्रलंबित है, वहाँ पानी भरने से कानून का यानी नर्मदा ट्रिब्यूनल का उल्लंघन होगा, सर्वोच्च अदालत के फैसलों की अवमानना होगी। इसलिए भी सरकारों का कर्तव्य है, हर परिवार का हक दिलाना। आदर्श पुनर्वास की बात तभी होगी जब हर किसान, हर भूमीहीन, हर विधवा माँ और हर व्यवसाय का,हर घर का नया निर्माण और जीवन, बसेगा। आज की मध्य प्रदेश सरकार हमारे साथ संवाद करने से जान चुकी है कि पिछले शासनकाल में कितने आदेश निकले, हमने न्यायालय से भी पाये। लेकिन उन पर पालन आधा अधूरा है और भ्रष्टाचार आज भी व्याप्त है।

  हम नर्मदा सत्याग्रही मानते है, कि..............

1.    डूब क्षेत्र के हर गांव में लगाए अधिकारी-कर्मचारियों का डेरा! गाँव सभा कहो या शिविर, आदिवासी क्षेत्र है, तो सहभागिता के साथ वही हो जाए निर्णय और निपटारा। हजारों अर्जियां, कम से कम 9000, जब कि शिकायत निवारण प्राधिकरण के सामने प्रलंबित है, और कितने सालों तक राह देखे पुनर्वास की? गाव स्तर पर विकेंद्रित और जनतांत्रिक पध्दती अपनाये, और जाँच परख के साथ सत्यवादी निर्णय हो जाए।


2.   हर गाव के मवेशियों के लिए चरागाह नहीं मृतों के लिए स्मशान नहीं, पीने के पानी तक की सुविधा ठीक से उपलब्ध नहीं और डूब रहे है, वसाहटों के क्षेत्र भी तो क्या पुनर्वास विस्थापितों को विकास प्रदान करेगा?, नहीं! ऐसी वसाहटों में नहीं बसेंगे विस्थापित! नहि अ-स्थायी कहकर बनाये गये करोडो रुपयों के टिन शेडस में जा सकते है, सामान, दुकान, या मवेशियों के साथ! टिन शेडस और भोजन-चारा शिबिरों में करोड़ों का खर्च और भ्रष्टाचार अब बंद करें सरकार! हर वसाहट में हर सुविधा देने के लिए ठेकेदार - अधिकारी गठजोड समाप्त होकर, युध्दस्तर पर कार्य किया जाए!

3.   2000,2005,2017 के सर्वोच्च अदालत के हर निर्णय ही नहीं, हर शासकीय आदेश का पालन होने तक किसी भी परिवार की संपत्ति, घर या खेत भी डूबने नहीं दे सकते! गुजरात शासन ने जबरन गेटस बिठाये लेकिन बिजली घर भी बंद रखा और मध्य प्रदेश के, महाराष्ट्र के आदिवासी और समाज एवं प्रकृति के त्याग की अवमानना की है। तो मध्यप्रदेश को चाहिए कि वह उपर के बांधो के ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर से बिजली ले पर गेटस न खोले। बर्गी से सरदार सरोवर तक के बांधो के पानी का नियमन, नियंत्रण सक्षमता और संवेदना के साथ, तकनीकी विशेषज्ञ तथा घाटी के नर्मदा बचाओ आन्दोलन की संगठित शक्ति को साथ लेकर ही करना होगा नियंत्रण।

4.   आंदोलन ने रखे है, 30 मुद्दे! हर मुद्दे पर म.प्र. शासन के समक्ष 6 महीनों से प्रलंबित रहे आवेदनों पर निर्णय लेकर निकाले जाए शासकीय आदेश! हाईकोर्ट और सर्वोच्च अदालत में प्रलंबित बिनाधार प्रकरणों की वापसी होकर आगे बढे!

5.   नर्मदा को जीवित रखने, निर्मल और अविरल बहने देना होगा। उसी के लिए करना होगा, पुनर्विचार। बड़ी नर्मदा लिंक परियोजनाओं से होगा सूखा का आक्रमण निमाड़ की खेती पर, नहीं तो जीवन, जीविका होगी बरबाद!  म.प्र. शासन निर्णय करें।

6.   सरदार सरोवर की लाभ-हानि, पर्यावरणीय असर आदिपर संपूर्ण जाँच- परख और विचार किया जाए। एक उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए, जिसके सदस्यों पर शासन और आंदोलन मिलकर निर्णय लिया जाए।

7.   बर्गी से लेकर सरदार सरोवर तक हर बांध के विस्थापितों को संपूर्ण पुनर्वास देने के लिए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण में सक्षम, भ्रष्टाचार मुक्त और संवादशील जनतंत्र और निरन्तर विकास में मानने वाले अधिकारियों को ही रखकर कार्यभार सौंपा जाए।

8.   नर्मदा की पर्यावरणीय सृष्टि का, लाखों पेड़, जंगल और रेत का विनाश होगा तो नदी का भी अंत होगा। इसलिए त्वरित रोक लगाई जाए, अवैध रेत खनन पर! पेड़ों की कटाई न करें, न हि वैकल्पिक वनीकरण के झूठे दावे मंजूर करें। जल ग्रहण क्षेत्र में चेक डेम्स और सभी उपचार करें........ खेती जीवित रखे, उस पर कोई योजनाओं का आक्रमण न होने दे। खेती आधारित उद्योग लगाए जाए। रोजगार स्थानीय युवाओं को स्थानीय संसाधनों से उपलब्ध कराए।


म.प्र. शासन को चाहिए की वह राजघाट पर विस्तृत चर्चा करें.......सत्याग्रहीयों के साथ निर्णय करें।



डूब आये या बाढ, नहीं हटेंगे हम! जीने का अधिकार, ले के रहेंगे हम!

   

आईये, जुडिये! गाव-गाव से सारियाँ बनाकर,

                         हर संगठन और समर्थक समूह से....शहर, जिले से!



भागीराम पाटीदार, बाला भाई, दयाराम यादव, रामेश्वर भिलाला, श्यामा-भारत मछुआरा, भागीरथ धनगर, वाहिद मंसूरी, शनोबर मंसूरी, जगदीश पटेल, सुरेश प्रधान, देवराम कनेरा, रणवीर तोमर, सरस्वती बहन, देवेसिंग तोमर, प्रकाश भाई, कैलाश यादव, कमला यादव, मेधा पाटकर

-: संपर्क :-

मुकेश भगोरिया – 9174181216, राहुल यादव – 9179617513, पवन यादव – 7354382148

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