*13 सितंबर से शुरू होंगे पितृ पक्ष, जानिए श्राद्ध का महत्व* डाँ. अशोक शास्त्री ~~

धार , मालवा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री ने बताया कि इस बार पितृ पक्ष 13 सितंबर से शुरू हो रहे हैं। पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक 15 दिन की विशेष अवधि में श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। श्राद्ध को पितृपक्ष और महालय के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है पितृपक्ष के दिनों में हमारे पूर्वज जिनका देहान्त हो चुका है वे सभी पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और पृथ्वी लोक पर जीवित रहने वाले अपने परिजनों के तर्पण को स्वीकार करते हैं।
*श्राद्ध किसे कहते हैं?*
ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री के मुताबिक श्राद्ध का मतलब श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करना। हिंदू शास्त्रों के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।
*कौन कहलाते हैं पितर*
जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हों, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया कि  पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते है और अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शान्ति आती है।
*कब बनता है पितृपक्ष का योग*
हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री ने कहा कि  पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है। शास्त्रों अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिणा से आरम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। भाद्रपद पूर्णिमा को उन्हीं का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन वर्ष की किसी भी पूर्णिमा को हुआ हो। शास्त्रों मे कहा गया है कि साल के किसी भी पक्ष में, जिस तिथि को परिजन का देहांत हुआ हो उनका श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना चाहिए।
  *जब याद ना हो श्राद्ध की तिथि*
डाँ. पं. अशोक शास्त्री के मुताबिक   पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है।शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।    डाँ. अशोक शास्त्री ने स्पष्ट करते हुए बताया कि यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।

*श्राद्ध किसे करना चाहिए*
डाँ. शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध का अधिकार पुत्र को प्राप्त है, लेकिन यदि पुत्र जीवित न हो तो पौत्र, प्रपौत्र या विधवा पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के न रहने पर पत्नी का श्राद्ध पति भी कर सकता है।

*श्राद्ध पक्ष 2019 की महत्वपूर्ण तिथियां*
पूर्णिमा श्राद्ध- 13 सितंबर - पूर्णिमा श्राद्ध , 14 सितम्बर - प्रतिपदा , 15 सितम्बर - द्वितीया  , 16 सितम्बर - तृतीया  , 17 सितम्बर  - चतुर्थी , 18 सितम्बर  - पंचमी महा भरणी  , 19 सितम्बर  - षष्ठी  , 20 सितम्बर  - सप्तमी  , 21 सितम्बर  - अष्टमी  , 22 सितम्बर  - नवमी  , 23 सितम्बर  -  दशमी  , 24 सितम्बर  - एकादशी  , 25 सितम्बर  - द्वादशी  , 26 सितम्बर  -  त्रयोदशी  , मघा श्राद्ध , 27 सितम्बर  - चतुर्दशी श्राद्ध  , 28 सितम्बर  - पितृ विसर्जन , सर्वपितृ अमावस्या ।
                          डाँ. अशोक शास्त्री


Post A Comment:

0 comments: