खिलेडी~~अब ग्रामीण क्षेत्र मे गुंजेगी की किलकारिया श्राद्ध पक्ष मे 16 दिनो तक ग्रामीण परिवंश मे बनाई जाती है~~

जगदीश चौधरी (खिलेडी)6261395702~~

संजा मनुष्य की आंतरिक अनुभूति की सौंदर्यात्मक सोच जब किसी कला के रूप मे परिवर्तित होती है, तो वह हमारी संस्कृति अौर लोककला के प्रतीक के रूप मे पहचानी जाती है।

कला की अभी व्यक्ति जब धर्म के माध्यम से की जाती है। तब वह अत्यधिक पवित्र अौर पूजनिय हो जाती है, धर्म कला को गंभीरता प्रदान करता है, तो कला भी धर्म पर  अपनी सोंदर्य को न्यौछावर करने मे कोई कसर बाकी नहीं रखी। धर्म का कलात्मक सौंदर्य अौर कला का धार्मिक स्वरूप पावन अौर गौरवशाली होता है, इसी खूबसूरत मिलन की देन है, ग्रामीण परिवंश का एक अनुष्ठा सा पर्व संजा है।

भादवमास की शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मे कुआरी कन्याअो द्धारा मनाया जाने वाला संजा पर्व ग्रामीण अंचल की विरासत है, जो मालवा निमाड का प्रचलित लोक उत्सव भी है।

आज शनिवार से ग्रामीण क्षेत्रों मे बालिकाओं द्धारा ताजा गोबर से संजा की आकृतिया बनाने का कार्यक्रम शुरू होगा। गुलदेवडी, कनेर, के गुलाबी पीले अौर चादनी के सफेद फोलो से संजा को सजाते है। ग्रामीण कन्याअो की आस्था लोक चित्रकारी के माध्यम से पहचानी जाती है, ग्रामीण क्षेत्रों मे मान्यता है। की कुवारी कन्याअो द्धारा संजा की आकृति बनाने  से उन्हें मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है, इस हेतु ग्रामीण बालिकाअो मे आकृषीक संजा बनाने की होड सी लगी रहती।


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