टांडा~इस लाकडाउन परिस्थितियों में भी मुनाफाखोरी, जमाखोरी व रिश्वतखोरी का है बोलबाला?*~~

वैश्विक महामारी संकट का उठा रहे है बेजा फायदा,~~

*राष्ट्र एवं मानवीय धर्म को कर रहे है शर्मसार।*~~

दीपक जायसवाल टांडा मो  9685833838~~

आज पूरा विश्व कोरोंना वायरस के संक्रमण काल से गुजरते हुएँ, लाकडाउन की परिस्थितियों मे,अपने हिन्दुस्तान को भी 50 दिन होने को आयें है।इस संक्रमण काल का सबसे ज्यादा प्रभाव उन प्रवासी मजदूरों को उठाने को मजबूर होना पड़ रहा है,जो अपने भविष्य, अपने परिवार की दो जून की रोटी की जुगाड़ में,अपने वतन अपनें गाँव से,कोई 100 तो कोई 1000 कि.मी. एवं उससें भी अधिक दूरी पर किसी रोजगार के लिये  पलायन कर वह महानगरों, उघोगनगरी पहुंचा था।,वह वहाँ जो कार्य कर रहा था,उसमें पारगंत भी हो चुका था।
ऐसे मे संक्रमण व लाकडाउन की परिस्थितियों मे,आम जनजीवन के साथ, सारी मशीनरीया,यानि सबकुछ ठप्प हो गया था। *मानों जैसे मानव जीवन ही ठहर सा गया।*
अब जो जहाँ था,उसे अपने वतन लौटने की जद्दोजहद कैसी करनी पड रही है,यह नजारा भी किसी से छिपा नही।जो गाँव नगर से लेकर महानगर मे था,उसे पहुँचने के लिये किन परिस्थितियों का सामना करना पड रहा है,यह हम सभी जान रहे है।
महानगर से गाँव तक,मानवीय संवेदनाओं वाले, फरिश्तों ने अपना मानवधर्म कैसे निभा रहे है,यह किसी से छिपा नही।इस संक्रमण काल मे,मानव से मशीनरीया तक ठप्प हो जाने से,जीवनपयोगी सामग्रियों का किस तरह अभाव बढ़ता गया, उन सामग्रियों के भाव बढतें गयें,यह भी किसी से छिपा नही।आम जनजीवन की प्रतिदिन उपयोग–उपभोग मे आनेवाली वस्तुओं की किस तरह मुनाफाखोरी कि गई वह भी किसी से छिपी नही।मुल्य से दूगनी ही नही पंचगुनी कीमत वसुलने मे भी मानवों का मानवीय जमीर ही मर चुका है।किस तरह जीवनपयोगी वस्तुओं की जमाखोरी कर,मुनाफाखोरी कि गई, वह मानवता,उनके धर्म को ही शर्मसार कर गई।
इसे रोकने के लिए प्रशासनिक कार्यवाही हुई, तो देखा गया कि उसमें भी रिश्वतखोरी से,साम्रगियों के और दाम बढ़ गये।
प्रत्येक मुनाफाखोर द्धारा जीवनपयोगी सामग्री की खरीदी–बिक्री करकें,इस संक्रमण काल के सारें नियमों को धत्ता बताकर,अपने जीवन से महत्वपूर्ण,धन की आवश्यकता को प्रतिपादित किया।उन्हें कोरोना वायरस का भय भी नजर ही नही आया।
अगर शासन-प्रशासन अपने  नियमों को लेकर सड़कों पर नही रहता या उतरता तो, सच मानियें कि,यह कोरोंना का संक्रमण अनगिनत मानव जीवन को लील जाता।
लोकतंत्रीय इस देश मे,यह देखकर तो ऐसा ही लगता है कि,मानवीय जीवन की सारी जिम्मेदारीयाँ,जैसे शासन–प्रशासन की ही पड़ी है। इस देश मे गरीब,व गरीबी रेंखा के नीचे जीवनयापन करना, लोकतंत्र का आर्शीवाद माना जाता है।कागजों पर इसी श्रेणी मे रहना ही,उनके उज्जवल भविष्य बनते है।जिसमे बच्चें पैदा होने से,उसके रोजगार, उसकी शादी, उसका आवास, आदि सब शासकों ने लोकतंत्र मे अपनी बादशाहत को टिकाऊ बनाने से लेकर,अपनें वोटबैंक को मजबूत व सुरक्षित करने के लिए, वह अन्नदाता, उसके राजनीतिक केरियर का प्राणदाता होता है।उसने अपनी इसी चाह मे,अपने ऐसे ही मतदाता परिवारों को ऐसे परावलम्बी बना दिया कि, आज जब यह संकटकालीन समय आया तो,वह अपनें पैरों पर,अपनी मजबूती के साथ, अपने आत्मसम्मान के साथ खड़ा नही हो सकता है।
*आखिर क्यों?*
यह कोरोंना हमे सब कुछ सचेत कर गया है कि,हम सावधान,संवेदनशील, सचेतन,जागरूक, हम अपनी मजबूती के साथ खड़े नही हुएँ तो,हमारा सभी दुर शोषण होगा।आज वही उसकी राजतंत्र के दाता, किसी दड़बें मे ही घुसकर दिखावे के लिए बिलबिला रहे है।सड़को पर, कंधेसे कंधा मिलाकर, संघर्ष से दूर ही,अकेले हालातों मे मँझधार हालातों मे पटक रखा है।
आज उसका मतदाता परिवार मुनाफाखोरी, जमाखोरी व रिश्वतखोरी से परिपूर्ण  भेडियों के शिकार हो रहे है,संघर्ष भी अकेले कर रहे है।
अब आप यहाँ देखिये,उन धनपिपासु भेड़ियों को,जो
प्रकृति को अपने शोषण का शिकार कर,अपनी तिजोरियों को भर रहे है।पहलें प्रकृति को अपना शिकार बनाया, जिसकी त्रासदियां हम भोग रहें है।वर्तमान समय मे,अब ये ही धनपिपासु भेड़िये प्रकृति के अनमोल खजाने नदी नालों का जमकर शोषण कर,शोषककर्ता अपनी  पीढ़ी, अपने मानवीय गुणों,अपने मानवता धर्म को ठेंगा बताकर,धन के ये भूखें  भेड़ियों, नदीयों के अस्तित्व को ही,अपने स्वार्थ का शिकार कर,ईश्वर के दिये हुएँ इस अनमोल खजाने को ही नष्ट करने को तूलें है,और कर रहे है।
हम देख रहे है कि,इस महामारी के संकट मे भी, धन के भूखे भेड़ियों द्धारा, किस तरह, जिम्मेदार प्रशासनिक विभागों को,अपनी मुनाफाखोरी मे हिस्सेदारी करकें,संरक्षण पाकर,प्रकृति का शोषण कर रहा है।
हम अपनी खुली आँखों से पिछलें दस दिनों से,देख रहे है कि,लाकडाउन खुला नही,न उस श्रेणी मे आया है,परन्तु धनपिपासु भेडिये,खनिज, राजस्व, व पुलिस विभाग को अपनी मुनाफाखोरी का,धनपेड़ करकें(जिसें हम रिश्वतखोरी कहेगें) प्रतिदिन सैकड़ो की संख्याओं में,कालीरात के अंधेरों से दिन के उजालों तक अपना उज्जवल भविष्य, इस रेत के हायवा मे,इन्ट्रीयों से अधिक मात्रा मे,अवैध परिवहन करने से कर रहे है।सोशल मीडिया व समाचार पत्रों मे खबरें प्रकाशित होनें के बाद भी,अपनी परिस्थितियों मे,अपनी शर्तो पर,रेत का अवैध परिवहन,इस क्षेत्र की बदनियती बन चुकी है।
इसे अपनी,हाईप्रोफाईल लाईफ स्टाइलिश जीवन जीने के लिये, उसकी नियति ने,इस क्षेत्र की प्रकृति को नेस्तानाबूद करनें मे कोई कोर कसर नही छोड़ रहा है।इस चक्कर मे,उसें यह भी भान (दिमागी अक्ल) नही है कि,क्या हम अपनी ही आनेवाली पीढ़ियों को एक त्रासदी भरी प्रकृति को सौपेंगे।जबकि सोचनीय-विचारणीय प्रश्न यह भी है कि, हमे भरपूर,चहूंओर चहचहाती, कलवर करती हुई,लहलहाती प्रकृति हमारे पूर्वजों ने सहेजकर इसलिये हमें सौंपी है कि,मानवधर्म के लिये यह सम्पदाओं का अमुल्य खजाना इसी तरह, तुम्हारी आनेवाली पीढ़ियों को सौंपजाना।
*ताकि तुम और वो(यानि–आने वाली पीढ़ी)सभी सुखी,व खुशहाल जीवन के साथ जीवन जी सके।*


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