बाकानेर~बाहर से समाजसेवी अंदर दर्द सहता पत्रकार ~~

बाकानेर( सैयद रिजवान अली)

विगत 69 दिनों से कोरोना संक्रमण के खतरे के बावजूद आम आदमी का दर्द बटोरकर प्रशासन तक पहुंचाने का उद्देश्य लेकर घूम रहे पत्रकार के अंदर का दर्द किसी ने नही जाना और न ही जान पाएगा। मेने नजदीक से इस दर्द को देखा और आज इसी को कलमबद्ध करने की कोशिश की है। घर मे आटा नहीं, पत्नी इंतजार में बैठी , इन्हें सांत्वना देकर पत्रकार घर से निकलते ही अपना दर्द भूलकर दूसरों के दर्द बांटने में जुट जाता है। घर से किराने के सामान की जुगाड़ में निकला पत्रकार जैसे ही बाहर आया कि उसके पास फोन आता है फलां जगह अनियमितता चल रही , वो खुद का काम भूलकर नीचे से लेकर ऊपर तक अधिकारियों को फोन लगाने में जुट जाता है। आम आदमी की समस्या में अपनी समस्या भूलकर जब शाम को घर पहुंचता है तो फिर होता है पत्नी से द्वंद, लेकिन इस द्वंद के बीच भी अगर किसी पीड़ित का फोन आ जाए तो वह फिर उसी को सुलझाने में जुट जाता है। दूसरों के लिए सुबह से लेकर रात तक जिले से लेकर प्रदेश तक के अधिकारियों से सामंजस्य बिठाकर समस्या निपटाने वाला पत्रकार आज खुद समस्या ग्रस्त है।
आलम यह है कि छोटे शहर एवं कस्बे के बिना सेलरी के काम करने वाले पत्रकारों का कामकाज लोगों से मिलने वाले विज्ञापनों पर टिका था। वहीं सेलरी पर कार्य करने वाले जिला स्तरीय एवं प्रदेश स्तरीय पत्रकारों की रोजी रोटी में भी इन्ही छोटे पत्रकारों का अहम रोल होता है। लेकिन आज कोरोना संक्रमण काल मे 69 दिन में कहीं से कोई विज्ञापन छपता नही दिखा। ऐसे में कई पत्रकार रोजी रोटी को भी तरस गए लेकिन मध्यम वर्गीय जीवन शैली की वजह से किसी से मांग भी नही सकते, और न ही अपनी पीढ़ा किसी से कह सकते हैं। क्या दुनिया को सच्चाई दिखाने वाले पत्रकारों का दुख बांटने भी कोई आगे आएगा। यह भी सत्य है कि पत्रकार ही वो प्राणी है जो खुद के लिए रोजी रोटी के ठिकाने नही होने के बावजूद पत्रकार बाहर से आए मजदूरों से लेकर बस्तियों में पीड़ित लोगों का दुख बांट रहे है। देश भर में प्रदेश सरकारों ने , केंद्र सरकार ने , समाजसेवियों ने, लाखों कमा कर लाए मजदूरों को फ्री में रॉशन उपलब्ध करवाया, समाज सेवियों ने भी मजदूरों को ही बांटा, सरकार ने किसानों को उचित भाव के साथ मुआवजा, सम्मान निधि वितरित की। लेकिन किसी ने भी समाज के चौथे स्तम्भ कहलाने वाले पत्रकारों के बारे में एक शब्द नही कहा। क्या इस दौर में बिना रोजी रोटी के समाज मे अपनी छवि बचाने के लिए जूझ रहे पत्रकारों के लिए भी कोई पत्रकार संगठन , कोई सरकार, कोई दल, कोई समाजसेवी आगे आएगा?
मप्र शासन ने विगत वर्ष पत्रकारों का स्वास्थ्य बीमा करवाया, क्या इस बीमे को पत्रकारों के पेट का स्वास्थ्य सही रखने के बीमे में परिवर्तित नही किया जा सकता?
राव भाट की तरह सरकार के चारण बनकर गुण गाने वालों के लिए सरकार कुछ करेगी? अथवा पत्रकार यूं ही भूख से बिलखते अपने परिवारों का दर्द सहते रहेंगे ?


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