अंजड~कोरोना नहीं उसके बाद की चिंता खाए जा रही है प्रवासी मजदूरों को~~

कोरोना वायरस की दहशत के बीच घर लौटने को मजबूर सोने के हाथों वाले मजदूर.~~

बिना किसी सरकारी मदत से पांच लाख खर्चा करने के बाद हुए बस से पश्चिम बंगाल रवाना हुए~~

सतीश परिहार अंजड~~

अंजड--कोरोना वायरस ने देश में कई तरह के बदलाव किए हैं। इनमें प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर वापसी भी शामिल है। पूरे देश में इस जानलेवा वायरस का असर फैलने की वजह से लॉकडाउन होने के कारण जहां इन मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है वहीं वहां जान के लाले पड़ गए हैं। यही वजह है कि मार्च के दूसरे सप्ताह से मजदूरों के पलायन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं है।

पहले जहां लोग जान की परवाह किए बिना भेड़-बकरियो की तरह ट्रेनों और बसों में भर-भर कर लौट रहे है वहीं अब नगर अंजड में सोने का काम करने वाले पश्चिम बंगाल के कारिगर भी अपने परिवार को लेकर गुरुवार दो हजार किलोमीटर की दूरी तय कर बस से अपने गांव-घर लौट रहे हैं। अखबार और टीवी चैनल भी गुजरात, हरियाणा और दिल्ली जैसे दूरदराज से इलाकों से बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों तक सपरिवार पैदल ही लौटने वाले मजदूरों की तस्वीरों से भरे हैं।

पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों से कमाने के लिए अंजड में पिछले तिस सालों से रह रहै कारिगर भी लौटने लगे हैं। इनमें से कुछ कारिगरों की घरवापसी की राह में पैदा मुसीबतों की दास्तान सुन कर रोंगटे खड़े हो सकते हैं। लेकिन अब इन मजदूरों को जान की परवाह नहीं है। उनका कहना है कि अपने घर में परिवार के बाकी लोगों के साथ भूखे रहना और मरना भी मंजूर है।

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले के रहने वाले राकिब अली रोजी-रोटी के लिए अंजड आकर सोने में नगिना लगाने का काम करते थे। यहां अपने गांव में उनको जहां रोज तीन से चार सौ रुपए मिलते थे वहीं अंजड में इससे दोगुनी तिगुनी रकम मिलती थी। यही वजह है कि तीन साल पहले गांव के कुछ युवकों के साथ वह भी अंजड चले आए थे। लेकिन अबकी कोरोना के चलते मचे आतंक और वापसी की अफरा-तफरी में उन्होंने जो कुछ भोगा है उसका शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

आकाश बताते हैं, “मार्च के पहले सप्ताह तक सब कुछ ठीक था। लेकिन उसके बाद अचानक आतंक का माहौल बन गया। इससे पहले में केरल में सोने का काम करता था वहां (केरल) की बाढ़ औऱ दो साल पहले फैले निपाह वायरस की यादें ताजा हो गईं। इसके बाद रातोंरात भगदड़ मच गई। कुछ दिनों तक ऊहापोह में रहने के बाद दूसरे लोगों के साथ मैं भी कोलकाता के लिए रवाना हुआ। और आज यहां से भी वापस जाना पड रहा है। फरिद बंगाली ने बताया हमारे द्वारा काम करने वाले दुकानदारों ने मदत तो कि है लेकिन उससे गुजारा नहीं हो रहा है आज पैतीस चालिस लोग अपने वतन वापस जा रहै है एक आदमी के लिए बस का किराया 4 हजार रुपयें है, कुल पांच लाख रुपये खर्च करने के बाद जा रहै है सरकार की तरफ से हमे कोई मदत नहीं मिली है।


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