*इस साल पांच महीने का होगा चातुर्मास, श्राद्ध पक्ष के बाद 20 से 25 दिन देरी से आएंगे सभी*~ *ज्योतिषाचार्य *डाँ. अशोक शास्त्री*

मालवा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री ने एक चर्चा में बताया है कि दिनांक 01 जुलाई 2020 को देवशयनी एकादशी है । इसी दिन से चातुर्मास शुरू हो जाएगा । चातुर्मास मतलब वो चार महीने जब शुभ काम वर्जित रहते हैं । जिसमें त्योहारों का सीजन होता है । देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी के बीच के समय को चातुर्मास कहा जाता हैं । ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री ने कहा कि इस बार अधिक मास के कारण चातुर्मास चार की बजाय पांच महीने का होगा. श्राद्ध पक्ष के बाद आने वाले सभी त्योहार लगभग 20 से 25 दिन देरी से आएंगे ।
            ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री ने बताया कि इस बार आश्विन माह का अधिक मास है । मतलब दो आश्विन मास होंगे । इस महीने में श्राद्ध और नवरात्रि । दशहरा जैसे त्योहार पड़ते हैं । आमतौर पर श्राद्ध खत्म होते ही अगले दिन से नवरात्रि शुरू हो जाती है । डाँ अशोक शास्त्री ने बताया कि इस बार ऐसा नहीं होगा । इस बार 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे और अगले दिन से अधिकमास शुरू हो जाएगा  जो 16 अक्टूबर तक चलेगा । 17 सितंबर को ही विश्वकर्मा पूजा भी है ।
*17 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू होगी*
          डाँ अशोक शास्त्री ने कहा इस तरह श्राद्ध और नवरात्रि के बीच इस साल एक महीने का समय रहेगा । दशहरा 26 अक्टूबर को और दीपावली 14 नवंबर को मनाई जाएगी , 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी रहेगी और इस दिन चातुर्मास खत्म हो जाएगा ।
*160 साल बाद बन रहा ऐसा योग, लीप ईयर और अधिक मास एक ही साल में*

ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री के मुताबिक 19 वर्ष पूर्व  2001 में आश्विन माह का अधिक मास आया था । अंग्रेजी कैलेंडर का लीप ईयर और आश्विन के अधिक मास का योग 160 साल बाद बन रहा है । इससे पहले 1860 में ऐसा अधिकमास आया था । जब उसी साल लीप ईयर भी था ।
*हर तीन साल में आता है अधिकमास*

          डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया कि एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है ।  जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है । दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर रहता है । ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है । डाँ. शास्त्री ने बताया कि इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है , जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास का नाम दिया गया है । अधिकमास के पीछे पूरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है । अगर अधिकमास नहीं होता तो हमारे त्योहारों की व्यवस्था बिगड़ जाती है । अधिकमास की वजह से ही सभी त्योहारों अपने सही समय पर मनाए जाते हैं ।

*चातुर्मास में तप और ध्यान करने का है विशेष महत्व*

           ज्योतिषाचार्य डाँ अशोक शास्त्री ने कहा कि चार्तुमास में संत एक ही स्थान पर रुककर तप और ध्यान करते हैं । चातुर्मास में यात्रा करने से यह बचते हैं , क्योंकि ये वर्षा ऋतु का समय रहता है , इस दौरान नदी - नाले उफान पर होते है तथा कई छोटे-छोटे कीट उत्पन्न होते हैं । इस समय में विहार करने से इन छोटे - छोटे कीटों को नुकसान होने की संभावना रहती है । इसी वजह से हमारे धर्म में चातुर्मास में संत एक जगह रुककर तप , ध्यान करते हैं । डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया कि हमारे धर्म ग्रंथों मे चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं । देवउठनी एकादशी के बाद विष्णुजी फिर से सृष्टि का भार संभाल लेते हैं ।
*अधिकमास को क्यों कहा जाता है मलमास*

          डाँ. अशोक शास्त्री ने कहा कि   अधिक मास में सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं । इस पूरे माह में सूर्य संक्राति नहीं रहती है , इस वजह से ये माह मलिन हो जाता है । इसलिए इसे मलमास कहते हैं । मलमास में नामकरण , यज्ञोपवित , विवाह , गृहप्रवेश , नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी जैसे शुभ कर्म नहीं किए जाते हैं । जय हो  ( डाँ. अशोक शास्त्री )

                  *ज्योतिषाचार्य*
          डाँ. पं. अशोक नारायण शास्त्री
         श्री मंगलप्रद् ज्योतिष कार्यालय
245 , एम. जी. रोड (आनंद चौपाटी ) धार , एम. पी.
                  मो. नं.  9425491351

            --:  *शुभम्  भवतु*  :--


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