*बाग /टांडा~लगता है प्रशासन, कोरोना की अतिरिक्त जिम्मेदारी से कार्यमुक्त हो गया?*~~

इसलिये गाँववासी भी हो गयें,बेखौफ, निडर,बिंदास।~~

*जैसे हो गई हो,कोरोना की बिदाई?*~~

*अब आम जनता को ही उठानी होगी, अपनी जिम्मेदारी~~

*क्योंकि कोरोना के प्रति लापरवाही ही कभी भी बम बनकर फुट सकती है?*~~

*भय यह भी है कि,प्रवासी मजदूर ही कही संक्रमण न ले आवें?*~~

दीपक जायसवाल टांडा
मोबाइल न 9685833838~~

बाग /टांडा–आज तक जनपद बाग टांडा कोरोनाकाल की चपेट मे नही आया,यह सभी का शौभाग्य रहा है। किन कारणों से नही आया, इसकी जद मे हम नही जा रहे है,क्योंकि जो धरातल पर दिख रहा है,बताया जाता है कि,उनके कारणों मे,सेंम्पलिंग,व बराबर जाँचें नही हो रही है,किलकोरोना की नौटंकी का दौर चल रहा,इस मुद्दें पर बाग के उप सरपंच ने विभाग को आड़े हाथों लेकर,C.M.O.तक अपनी बात पहुंचाई थी कि,
स्वास्थ्य विभाग बाग बजट की खानपूर्ति कर,मजें मार रहा है?
इधर मैदानें जंग लगा रहा,प्रशासन भी सुप्त अवस्था मे चला गया है।शायद वह सोचता होगा कि,समझदार मानवजाति को हमनें कोरोनाकाल मे किस जीवनशैली के साथ जीवनयापन करना है,दो माह की मशक्कत मे समझा दिया है,अब आमजनता की भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है।इसलिये लगता है कि,प्रशासन भी अब अपनी इस अतिरिक्त जिम्मेदारी से मुक्त होकर, अपना कर्मयोगी बनकर,अपने-अपने घरौंदे मे लौट गया है।
*इधर शासन ने परिवहन की छुट क्या दी,इस क्षेत्र से पलायन कर,गुजरात विस्थापित हो चुका, उन मजदूरों के आनें-जानें का बिंदास-बेखौफ क्रम जारी  है।*
अपुष्ट खबरों के अनुसार, गुजरात मे कोरोना के बढ़तें संक्रमण का असर, इन प्रवासी मजदूरों के साथ,कही यह क्षेत्र चपेट मे न आ जावें,?इसमें कोई अतिश्योक्ति भी नही।गुजरात का कोरोना बम ही बाग टांडा क्षेत्र मे,कही भी,कभी भी फुटने के भय नें,क्षेत्रवासियों को आक्रांत कर रखा है?
यहाँ से प्रतिदिन गुजरात के राजकोट,मोरवी, जामनगर,सुरत,अहमदाबाद आदि महानगरों के लिए, प्रतिदिन स्लीपर बसों का पिछले कई दिनों से हो रहा,परिवहन आवागमन जारी है।जिसमें इस क्षेत्र का विस्थापित प्रवासी किसान, मजदूरों का,महंगे किराए के बावजूद भी, आने जाने का क्रम निरन्तर जारी है।अगर प्रशासन ने शक्ति नही करी तो,निश्चित मानियें कि,गुजरात का *कोरोना* इस शांत टापू मे कही हलचल न मचा दें।
ऐसा लगता है?शायद हलचल तक तक वे अपने विभाग की जिम्मेदारी निभा रहे है,ऐसा लगता है।जैसे बारिश के पूर्व कि तपन?
इधर पुलिस, जैसे वह दो माह के कोरोनाकाल मे, उसकी हरियाली ही सुख सी  गई थी, थोड़ी बहुत बरसात से हरियाली आई है,वह भी  अपनी नजरों से इस हरियाली का आन्नद लेने मे व्यस्त-मस्त हो गई लगती  है।क्योंकि यहाँ नवागंत T.I. की सज्जनता, सादगीपूर्ण, कुशल व्यवहार,आमजनता को न्याय, वास्तविक दोषियों को ही सजा मिलें,उनके इस व्यवहार से,उनके निचलें स्टाफ की पौं बारह नजर आ रही है।अगर आप T.I. की अनुपस्थिति मे थानें चले जायें तो,थानाकर्मियों को आप जागरूकजनों मे *कोरोना* नजर आता है?देखा गया।
खैर, प्रशासन से भयमुक्त यहाँ का निवासी बेखौफ, बिंदास, निडर होकर घुम रहा है।व्यापारी अपना व्यापार-व्यवसाय कर रहा है,उसें *कोरोनाकाल* मे जिन नियमों अन्तर्गत अपनी जीवनशैली जीना है,वह अपनी आदत नही बना पाया, वह प्रशासन की दो माह की मशक्कत को भूल चुका है। जिसका खामियाजा भुगतना न पड़ जावें।जिसमें उसके घातक परिणाम की संभावनाओं से भी इंकार इसलियें नही किया जा सकता है कि,नियमों का पालन न तो स्वविवेक से हो रहा है,और न ही प्रशासन,जो मैदानेंजंग खड़ा रहता था,न तो उसका भय है? सबकुछ ऐसे रह रहे है,जैसे *कोरोना* की बिदाई हो गई हो,मानसून आ गया हो?
*जैसें भय बिन न होई प्रीत?* --------/-------?
खैर हमें इस कोरोनाकाल से किला लड़ना है तो, हमें ही कोरोनाफायटर बनना होगा,और बनाना होगा।हमें अपनी जागरूकता के साथ अपनी जीवनशैली को बदलना होगा।हमें अपनी दोहरी जिम्मेदारी निभानी होगी, तभी तो हम सुरक्षित जीवन जी सकेगे।आखिर प्रशासन भी कब तक मैदानेंजंग रहेंगा, क्योंकि इस   कोरोना संक्रमण का प्रभाव लंबें समय तक रहना है,और शासन–प्रशासन को भी कई जिम्मेदारियों के साथ चलना है।
इसलिये हमें बीमारी से लड़ना है,प्रशासन के भय का इन्तजार नही करना है


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