*रक्षाबंधन पर ब्राह्मण क्यों करते हैं श्रावणी उपाकर्म , महत्व व पूजा - विधि* ~~

          श्रावण मास की पूर्णिमा महत्वपूर्ण होती है । एक ओर जहां इस दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर इस दिन श्रावणी उपाकर्म भी किया जाता है । श्रावणी उपाकर्म: संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
         मालवा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया की श्रावणी उपाकर्म वैदिक ब्राह्मणों को वर्ष भर में आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करता है । वैदिक परंपरा अनुसार वेदपाठी ब्राह्मणों के लिए श्रावण मास की पूर्णिमा सबसे बड़ा त्योहार है । इस दिन यजमानों के लिए कर्मकांड यज्ञ , हवन आदि करने की जगह खुद अपनी आत्मशुद्धि के लिए अभिषेक और हवन किए जाते हैं।
ऐसे किया जाता है श्रावणी उपाकर्म
इस दिन प्रातःकाल में दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद स्नान करते हैं । फिर कोरे जनेऊ की पूजा करते हैं । जनेऊ के गाठ में ब्रह्म स्थित होते हैं, उनके धागों में सप्तऋषि का वास माना जाता है । ब्रह्म और सप्तऋषि पूजन के बाद नदी या सरोवर में खड़े होकर ब्रह्मकर्म श्रावणी संपन्न होती है । पूजा किए गए जनेऊ में से एक जनेऊ पहन लेते हैं और बाकी के जनेऊ रख लेते हैं । पूरे वर्षभर जब भी जनेऊ बदलने की आवश्यकता होती है तो श्रावणी उपाकर्म के पूजन वाले जनेऊ को ही पहनते हैं।
रक्षाबंधन पर किया जाता है श्रावणी उपाकर्म 
               *श्रावणी उपाकर्म*

सबसे पहले तो आप ये जान लें कि श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय।
सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं।
स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है।
आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं ।

           डाँ. अशोक शास्त्री ने कहा कि इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।
उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है।
*श्रावणी उपाकर्म की ऐसे होती है पूजा*
 
जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद - वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। डाँ, अशोक शास्त्री बताया कि इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है।
वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।

             **ऋषि पूजन का महत्व*

डाँ, शास्त्री के मुताबिक श्रावणी उपाकर्म के दिन ऋषि पूजन किया जाता है। ऋषि पूजन के पीछे उच्चतम आदर्श की परिकल्पना निहित है। ऋषि जीवन ने ही महानतम जीवनश्चर्या का विकास और अभ्यास करने में सफलता पाई थी। ऋषि जीवन आंतरिक समृद्धि एवं ऐश्वर्य का प्रतीक है। यह सौम्य जीवन के सुख और मधुरता का पर्याय है। आज के समाज की भटकन का कारण ऋषित्व का घनघोर अभाव है। इस पूजन से इन्हीं तत्त्वों की वृद्धि की कामना की जाती है।
*ब्राह्मणों द्वारा किया जाता है श्रावणी उपाकर्म , रक्षाबंधन को बन रहा सौभाग्य योग रक्षाबन्धन अर्थात् भाई की कलाई में राखी बांधने का मुहूर्त- सर्वार्थ योग में*

डाँ, अशोक शास्त्री बताते है कि इस वर्ष श्रवण नक्षत्र में पूर्णिमा होने से सर्वार्थ सिद्धि योग , एवं आयुष्मान   दीर्घायु का भी संयोग बन रहा है , जिसकी वजह से इस बार का रक्षाबंधन बहुत शुभ रहने वाला है । इस दिन चंद्रमा का ही श्रवण नक्षत्र है , मकर राशि का स्वामी शनि और सूर्य दोनो आयु बढाते है । ऐसा संयोग 29 साल बाद आया है।

             *रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त*

राखी बांधने के समय भद्रा नही होनी चाहिए , कहते है कि रावण की बहन ने उसे भद्रा काल मे ही राखी बांध दी थी इसलिए रावण का विनाश हो गया । 03 अगस्त को भद्रा प्रातःकाल  09 : 29 मिनट तक रहेगी ।, अत: राखी का त्योहार प्रातः 09 : 30 से 10:46  बजे तक रहेगा । दोपहर 01 : 37 से  सायं 07 : 17 बजे तक श्रेष्ठ समय है । इसके बाद सायं 07 : 17 से 08 : 47 के बीच अच्छा मुहूर्त है ।

         *श्रावणी उपाकर्म का महत्व*

          श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला श्रावणी उपाकर्म ब्राह्मणों व द्विजों का सबसे बड़ा पर्व है । डाँ.    अशोक शास्त्री ने बताया कि वैदिक काल से द्विज जाति पवित्र नदियों व तीर्थ के तट पर आत्मशुद्धि का यह उत्सव मनाती आ रही है , पर वर्तमान समय में ब्राह्मण व वैदिक श्रावणी की परंपरा को भूलते जा रहे हैं । इस कर्म में आंतरिक व बाह्य शुद्धि गोबर , मिट्टी , भस्म , अपामार्ग , दूर्वा , कुशा एवं मंत्रों द्वारा की जाती है । पंचगव्य महाऔषधि है । श्रावणी में दूध , दही , घृत , गोबर , गोमूत्र प्राशन कर शरीर के अंतःकरण को शुद्ध किया जाता है  । ( डाँ. अशोक शास्त्री )

                  *ज्योतिषाचार्य*
          डाँ. पं. अशोक नारायण शास्त्री
         श्री मंगलप्रद् ज्योतिष कार्यालय
245 , एम, जी, रोड, ( आनंद चौपाटी ) धार , एम, पी,
                  मो, नं,  9425491351

             --:  *शुभम्  भवतु*  :--


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