हमारा ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है, जैसे शेर कह देने वाले शायर राहत इन्दोरी का दुःखद विदा होना~~

बकानेर (सैयद रिजवान अली)

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो
ये गहरी बात इतने सादे शब्दों में कहने वाले शायर राहत इन्दोरी आज अंनत में विलीन हो गये।उनके चंद शेर देखिए:-
*उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो*
*धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है*
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*न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा*
*हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा*

*दोस्ती जब किसी से की जाए*
*दुश्मनों की भी राय ली जाए*
राहत साहब का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ। प्रारंभिक शिक्षा नूतन स्कूल इंदौर में हुई। इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया।
उनके गीतों को 11 से अधिक ब्लॉकबस्टर बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किया गया। जिसमें से :-सर, मुन्ना भाई एमबीबीएस एक है।
*बुम्बरो बुम्बरो श्याम रंग बुम्बरो* हो या *तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नही है* जैसे गीत हो राहत साहब के शब्दों की सादगी हर जगह स्पष्ट रूप से दिखती है बिना क्लिष्ट शब्दों में उलझे सादे शब्दों में आवाम की ज़बान में बड़े ओर गम्भीर शेर कह देना उनकी ख़ासियत थी।
सादर श्रद्धाजंलि।


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