भगवान के बाद जीवन में डॉक्टर ही आशा की किरण जगाता है~~



बाकानेर धार सैयद रिजवान अली~~

डॉक्टर वह होता है, जो जीवन को नई रोशनी दिखाता है, बीमारी के अंधेरों से स्वस्थ्य जीवन की रोशनी जगाता है,नए जीवन के साथ फिर से जीना सिखाता है, भगवान के बाद डॉक्टर ही जीवन में आशा की किरण जगाता है, इसीलिए भगवान का दूसरा रूप कहलाता है । परमात्मा ने अपना स्वरूप देकर हमारा ख्याल रखने के लिए मां और डॉक्टर को धरती पर भेजा है । धरती पर धर्म सिर्फ एक ही हैं, जिसका अस्तित्व मानव जन्म के साथ मानवता का जन्म  हुआ है, जिसका अंत भी मानवता के अंत के साथ ही होगा । इस दौर में मानवों के कई रूप देखे गए हैं,रक्षक और भक्षक। रक्षक की श्रेणी में सबसे ऊपर डॉक्टर,पुलिस, सेना,अंत में हम लोग यानी देशवासी, पर इस दौर में भक्षकॊ की भी कमी नहीं हर इंसान के दो चेहरे होते हैं, एक अच्छाई का दूसरा बुराई का,जब अच्छाई पर बुराई हावी हो जाए तो भक्षक जन्म लेता है । जैसे दिन में तीन पहर होते हैं, सुबह दोपहर, और शाम।
आज मैं तीन अलग-अलग प्रकार के डॉक्टरों के बारे में  लिख रहा हूं।
सबसे पहले बात करते हैं, कोरोना के मरीज़ो के बारे में और कोरोना के अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों के बारे में, ग़रीब मरीज़ जिसका कोई माई बाप नहीं होता, उनके लिए यह अस्पताल जेल से कम नहीं, यहां मरीज़ एक बार दाखिल होता है, तो उसके परिजनों को दो बार फोन आता है, आपका मरीज़ ठीक हो गया या उसकी मृत्यु हो गई है । जो मरीज़ की मृत्यु कोरोना की वजह से होती है, वारिसो के होने के बावजूद उसका हाल लावारिसो की तरह हो जाता है, उसके शरीर को प्लास्टिक में लपेटकर नगर निगम के द्वारा कब्रस्तान या शमशान भेज दिया जाता है, परिजन तरसते हैं, अपनों को अस्पताल में देखने के लिए पर अस्पताल वाले दिखाना तो दूर मरीज़ से बात तक नहीं करवाते मेरे एक परिचित है, उनकी बहन की मृत्यु कोरोना की वजह से भोपाल के कोरोना अस्पताल में हो गई,वह पिछले 45 दिनो से मौत और ज़िदगी से जूझ रही थी यह महिला को कोरोना से पहले कोई बीमारी नहीं थी, केवल उसके पैरों में दर्द था, जब वह एक निजी अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने गई तो निजी अस्पताल के डॉक्टर ने 2 दिन अस्पताल में भर्ती रखा और ₹40000 का अस्पताल का बिल बना दिया,जब परिजनों के पैसे खत्म हो गए तो परिजनों से डॉक्टर बोले अब आप इनको किसी सरकारी कोरोना के अस्पताल में दाखिल करवा दें, इनको कोरोना है, भोपाल के एक कोरोना अस्पताल में उनको दाखिल करवाया गया 45 दिन मौत और ज़िदगी से जूझती रही और बेटे अपनी मां की जानकारी के लिए भटकते रहे,अंत में वैसे ही फोन आया,आप की मां का देहांत हो गया है, उन बेटों की दुनिया उजड़ गई,पेशे से हम्माली करते है ।  उस बेटे ने हम्माली कर के जो पूंजी बनाई थी, निजी अस्पताल वालों ने लूट ली । जब इन बेटों ने अपनी के मां का शरीर को देखा तो उनके आंसू रुक नहीं रहे थे,जगह-जगह से शरीर कटा पीटा था और पूरी पीठ पर घाव थे और इन ज़ख्मों से खून बह रहा था।
मध्य प्रदेश सरकार को इस ओर ध्यान देना पड़ेगा, परिजनों को दिन में दो बार उसके मरीज़ को टीवी स्क्रीन के ज़रिए अस्पताल के बाहर से दिखाना चाहिए, मरीज़ को टीवी स्क्रीन पर देखने से परिजनों को  संतुष्टि हो जाएगी और उनको पता चलेगा कि उनके मरीज़ का इलाज ठीक से चल रहा है या नहीं,परिजनों से जब मरीज़ से बात होगी, तो मरीज़ को भी संतुष्टि मिलेगी और परिजनों को भी । यह है, पहला रूप डॉक्टरों और अस्पतालों का।
अब दूसरा रूप डॉक्टरों का हम आपको बताते हैं ।
एक डॉक्टर जो लोगों के जीवन को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह किए बगैर दिन-रात लगा रहता है, अगर वही डॉक्टर हत्यारा बन जाए तो इस युग को कलयुग कहना गलत नहीं होगा ।
आगरा के डॉक्टर विवेक तिवारी ने एक महिला डॉक्टर का पहले गला दबाया , फिर चाकू से सिर  और गले पर वार करके एक होनहार डॉक्टर को हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया
आगरा में दो दिन पहले हुए महिला जूनियर डॉक्टर की हत्या के आरोपी डॉक्टर ने पुलिस के सामने अपना गुनाह कबूल किया। उसने बताया है, कि सात साल से रिलेशनशिप में रहने के बाद उनकी लड़ाई होने लगी थी। उस से परेशान होकर गुस्से में आकर पहले गला दबाया और फिर चाकू से हमला कर दिया।
जिस महिला डॉक्टर ने आगरा के कोविड अस्पताल में कोरोना पीड़ित महिला मरीज की डिलीवरी करवाई थी ,पहली किलकारी सुनवाई थी, उस होनहार डॉक्टर की हत्या से पूरा शहर सन्न है। 
डॉक्टर का तीसरा रूप ऐसा भी है।  हमारे देश में ऐसा भी एक डॉक्टर है, जिसका लक्ष्य केवल मानव सेवा और गरीबों की सेवा
है। एमबीबीएस एमडी डॉक्टर जिसका जीवन किसी संत के जीवन से कम नहीं, जो खुद चलकर मरीजों के पास जाता है, और मरीजों को देखने के एवज में केवल ₹5 फीस लेता है, उसके यहां सब  बराबर होते है, ना कोई अमीर, ना कोई गरीब
ना जात- पात, ना धर्म का बंधन,
रात हो या दिन हर वक्त इलाज को तत्पर । यह संत डॉक्टर शंकर गौड़ा,₹5 वाले डॉक्टर के नाम से मशहूर ,ना क्लीनिक ,ना हॉस्पिटल गली के नुक्कड़ के चबूतरे पर बैठ कर लोगों का इलाज करते हैं, और प्यार की मरहम पट्टी करते हैं।
जहां पूरे भारत के डॉक्टर पैसे के पीछे भाग रहे हैं ,लाशों को वेंटीलेटर पर रखकर पैसे कमा रहे हैं ,बीमारी के नाम पर महंगे महंगे टेस्ट करवा रहे हैं ,आदमी की नब्ज़ पकड़ते ही एक हज़ार रुपए  की फीस का मीटर चालू हो जाता है, जब जब डॉक्टर साहब को दिखाना है, पहले एक हजार रुपए जेब में रखकर लाना है । डॉक्टर साहब का हर चीज में कमीशन बना हुआ है, ब्लड टेस्ट हो ,एक्स-रे हो ,ईसीजी हो या सोनोग्राफी । जितने पेशेंट टेस्टिंग के लिए भेजते हैं ,शाम को डॉक्टर साहब का कमीशन का लिफाफा क्लीनिक पर पहुंचे जाता है ।
वही शंकरगौड़ा मात्र ₹5 लेते हैं और लोगों को बहुत सस्ती जेनेरिक दवाएं पर्चे पर लिख कर देते हैं ,मरीज का इलाज मात्र 25 ₹30 में हो जाता है, और मरीज भी ठीक हो जाते हैं । डॉक्टर शंकर गौड़ा रुपयों से इंसानि‍यत को अधिक महत्त्व देते हैं, स्थानीय लोग 5 रुपए वाला डॉक्‍टर कह कर बुलाता है। यह डॉक्टर कर्नाटक के रहने वाले हैं, डॉक्टर शंकर गौड़ा  हर दिन लगभग पांच सौ बीमारों का उपचार करते हैं। डॉ गौड़ा मरीज को पांच रुपए में उपचार का पूरा पैकेज उपलब्ध कराते हैं। इसमें जांच, परामर्श, दवाई लिखना और इंजेक्शन सहित चिकित्सा शामिल है।
वह बीते 35 वर्षों से कर्नाटक के इस गन्ना बहुल जिले में अपनी प्रैक्टिस कर रहे हैं। शिवाली के पैतृक और बांडी गौडा के रहने वाले डॉ गौड़ा के चाहने वाले पूरे जिले में फैले हुए हैं। उन्होंने अच्छे वेतन की पेशकश के बाद भी किसी निजी अस्पताल को अपनी सेवाएं नहीं दी और न ही अपनी फीस में वृद्धि की है।  मणिपाल के मशहूर कस्तूरबा मेडिकल लेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने के बाद डॉ गौड़ा ने परास्नातक डिप्लोमा किया। चर्म रोग के विशेषज्ञ डॉ गौड़ा एक मिठाई की दूकान पर बैठ कर मरीजों को देखते हैं।
उनकी लोकप्रियता के चलते दूर दराज से लोग उनके पास इलाज करवाने आते हैं। शिवालिक के रहने वाले डॉक्टर गौड़ा मांड्या में प्रैक्टिस किया करते थे, जो उनके गांव से लगभग 12 किलोमीटर दूर है। उन्होंने नोटिस किया कि उनके इलाके के कई लोग वहां उपचार के लिए आते हैं।
इसके बाद उन्होंने निर्धारित किया कि वह अपने गांव जाकर वहीं प्रैक्टिस करेंगे। गौड़ा डॉक्टरी के अतिरिक्त छोटे पैमाने पर खेती-बाड़ी भी करते हैं। इतने सालों का अनुभव होने के बाद भी डॉ गौड़ा के पास अभी तक खुद की गाड़ी नहीं है। रोज़ाना वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से अपने क्लीनिक पहुंचते हैं। हर दिन की तरह यहां हमेशा लंबी लाइन लगी रहती है। रोगियों की भीड़ कितनी भी हो वह सभी मरीजों को देखे बिना नहीं उठते। उनके पास आने वाले अधिकतर मरीज उपचार से संतुष्ट दिखाई देते हैं।


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