काश आज के अशोक और अंसारी यह समझ पाते~~

बाकानेर सैयद रिजवान अली~~

देश दुनिया में लड़ाई झगड़ा जब भी होता है  तो गुजरात दंगों के वह चेहरे  हम सबके सामने आ जाते हैं जिन्हें  पूरी दुनिया ने लाखों करोड़ों बार देखा है माथे पर भगवा पट्टी लपेटे अशोक परमार और रोते हुये हाथ जोड़े कुतुबुद्दीन अंसारी , दोनों गुजरात दंगों (2002) के आइकॉनिक चेहरे . . इतने वर्षों बाद जब अपना अतीत देखते हैं तो दोनों गले लगकर रो देते हैं ! कुतुबुद्दीन ने जब अपनी पुस्तक का विमोचन किया तो अशोक को बुलाया और जब अशोक परमार ने जूते की दुकान खोली तो उसका उद्घाटन करने के लिए कुतुबुद्दीन अंसारी को बुलाया ! आज दोनों ने अतीत को पीछे छोड़ और सबक लेकर एक नई जिंदगी शुरू कर दी है . . .

नेताओं की सरकारें बन जाती हैं , उनके बच्चे विदेश पढ़ने चले जाते हैं , लौटते ही विरासत में कुर्सी तैयार . . . पार्टी चाहे बीजेपी हो , कांग्रेस या कोई और . . . नफ़रतों की आग में झुलसते आम आदमी ही हैं !

काश , आज के अशोक परमार और कुतुबुद्दीन अंसारी यह समझ पाते ! मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना


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