*देवर्षि नारद जयंती: ब्रह्मांड के पहले 'पत्रकार' की कहानी, ऐसे हुई थी इनकी उत्पत्ति( डाँ. अशोक शास्त्री )*

नारद मुनि का नाम आते ही कानों में एक ही शब्द गूंजता है "नारायण - नारायण" नारद मुनि जो नारायण के परम भक्त व देवताओं के बीच संवाद तंत्र थे । उक्त जानकारी देते हुए मालवा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री ने एक विशेष मुलाकात मे बताया कि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माने गए हैं । ब्रह्मांड के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद की जयंती 27 मई को मनाई जाएगी । श्रद्धालु विधि - विधान से देवर्षि नारद की पूजन - अर्चन कर उन्हें प्रसन्न करेंगे । ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ माह की प्रतिपदा के दिन भगवान विष्णु भक्त नारद का जन्म हुआ था । ऐसे में इस दिन नारद जयंती मनाई जाती है । ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार संगीत और वीणा के जनक देव ऋषि नारद का जन्म सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के कंठ से हुआ था । इन्हें तीनों लोकों में वायु मार्ग द्वारा विचरण करने का वरदान प्राप्त है । इस दिन नारदजी की पूजा करने से व्यक्ति को बल और बुद्धि मिलती है ।
          ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया की इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के बाद देवर्षि नारद की पूजा अर्चना करनी चाहिए । नारद जयंती के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प करें , पूजा-अर्चना करें । नारदजी को चंदन , तुलसी के पत्ते , कुमकुम , अगरबत्ती , फूल अर्पित करें । शाम को पूजा करने के बाद , भक्त भगवान विष्णु की आरती करें । ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें सामर्थ्य अनुसार दान करें ।
          ज्योतिषाचार्य डाँ. अशोक शास्त्री ने बताया कि धार्मिक मानयताओं के अनुसार नारद जी पूर्व  जन्म मे " उपबर्हण " नाम के गंधर्व थे । उन्हे अपने रुप पर बहुत घमंड था । एक बार अप्सराएं गंधर्व गीत और नृत्य से ब्रम्हा जी की आराधना कर रही थी , तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वंहा आए । उपबर्हण का यह अशिष्ट आचरण देख कर ब्रम्हा नाराज हो गए और उन्हे " शूद्र योनि " मे जन्म लेने का श्राप दे दिया । डाँ. शास्त्री बताया की ब्रम्हा जी के श्राप के फलस्वरूप नारदजी का जन्म  " शूद्र दासी " के घर पर हुआ । इसके बाद उन्होंने प्रभु की भक्ति की तो उन्हे एक दिन ईश्वर के दर्शन हुए । इससे उनके मन मे ईश्वर और सत्य को जानने की लालसा बढ गई । उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे बालक इस जन्म मे तुम मेरे दर्शन नही कर पाओगे । अगले जन्म मे तुम मेरे पार्षद होंगे । इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की , जिसके फलस्वरूप ब्रम्हा जी के मानस पुत्र के रूप वह अवतरित हुए ।

                   *ज्योतिषाचार्य*
          डाँ. पं. अशोक नारायण शास्त्री
          श्रीमंगलप्रद् ज्योतिष कार्यालय
245 , एम. जी. रोड ( आनंद चौपाटी ) धार , एम. पी.
                  मो. नं.  9425491351

                *--:  शुभम्  भवतु  :--*


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