रिंगनोद~एक पहलवान जिनके लिए शरीर किसी भगवान से कम नही होता ने हादसे मै खोए अपने दोनो पैर दुगनी हिम्मत से दिव्यांग होते हुए जिवन फिर किया शुरु आज सभी जगह है ईनके कारनामो से ईनकी पहचान वो कहते है ना पंखो से कुछ नही होता होसलो से उडान होती है विचार न्युज मण्डे मोटीवेशनल स्टोरी की चौथी कडी मै आज पढीए होसले और हिम्मत से भरी एक और कहानी~~

अनुराग डोडिया रिंगनोद~~

आज विचार न्युज की मण्डे मोटीवेशनल स्टोरी मै हम बात कर रहै है पहलवान और बजंरग दल अखाडा मै अपना महत्वपुर्ण योगदान देने वाले रमैश मोलवा की रिंगनोद मै प्रारंभ से ही मोतीलाल नेरु व्यायामशाला गनी उस्ताद और बंजरग दल अखाडा रहै है हर त्योहार चाहै डोल ग्यारस का पर्व हो या अनंत चतुर्दशी की झांकी ईन दोनो अखाडो के पहलवान अपने करतबो से जुलुस की आगवानी करते हुए अपने करतबो से लोगो को दांतो तले उंगली दबाने पर मजबुर कर देते थे समय बीता और व्यस्तता और आधुनिकीकरण मै यह कम होता चला गया उन्ही पहलवानो मै  शुमार एक पहलवान रृमैश मोलवा भी थे गाःव ही नही आस पास के क्षैत्रो मे भी अखाडे के साथ जाते थे जिवन चलता रहा अचानक अपने खेत पर काम करते हुए अक्टूबर 2012 को करंट लगने और बिजली के खंभे से गिरने का ईनके साथ हादसा हुआ गंभीर रुप से झटका लगने के कारण मोलवा ने अपने दोनो पैर खो दिए संघर्ष की शुरुआत यही से हुई बजाय हार मानते हुए और अपने आप को दिव्यांग ना मानते हुए दुगुने जोश से जिवन शुरु कीया मोलवा का मानना है ईन्सान शरीर से दिव्यांग हो सकता है मन और दिमाग से नही उनकी ईसी सोच और उनके मन ने अपने आपकी दिव्यांगता को नकारते हुए आगे बढने की प्रेरणा दी कई किलोमिटर व्हील चैयर  को हाथो से ले जाना खेत पर नित्य जाना ईनका रोजमर्रा का काम था लोग कहते पहलवान रहै है ईतने पर कोई प्रभाव नही पढता अचम्भा तब हुआ जब सैकडो कीलोमिटर राजस्थान भगवान खाटू श्याम बाबा मन्दिर  की यात्रा मोलवा ने पैदल यात्री दल के साथ बिना थके अपनी व्हील चैयर से की जोश ईतना की पैदल चलने वाले हत प्रभ रहै ना थकान ना अस्वस्थता जगह जगह स्वागत हुआ सभी समाचार पत्रो और सुर्खीयो के साथ मौलवा चर्चा मै रहे नन्हे नन्हे बालक बालिकाओ को तैय्यार कर अपना सस्तित्व खोती जा रही पांरपंरीक मलखंभ और रोप मलंखभ जैसी खतरनाक विधा मै ईतना निपुण बनाया की आज वे तहसील जिला और संभाग ही नही बच्चे प्रदेश स्तर की प्रतियोगिताओ मै भी पुरुस्कृत हुए आस पास की प्रतियोगिता हो या बालिकाऔ की कावड यात्रा मोलवा 40-50 कीमी का सफर सहद ही व्हिल चैयर से तय कर लेते है आज अपने आपको दिव्यांग समझ मायुस होने वालो के लिए मोलवा एक प्रेरणा बनकर उभरे है ईनके ईस जज्बे को विचार न्युज सलाम करता है और ईनकी कही ईस बात का समर्थन करता है कि *ईन्सान शरीर से दिव्यांग हो सकता है मन और होसले से नही होना चाहिए* मिलते है अगले सोमवार मण्डे मोटीवेशनल स्टोरी मै एक नयी कहानी के साथ


Share To:

Post A Comment: