बाकानेर~करोली और उदियापुर में  जयस प्रदेश अध्यक्ष लालसिंह बर्मन  के नेतृत्व में भगवान टंटिया भील कि शहादत दिवस  धूमधाम से मनाया गया~~

बाकानेर {सैयद अखलाक अली}

जयेश प्रदेश अध्यक्ष लाल सिंह बर्मन शरद कनेल ने बताया क्रांतिकारी टंट्या मामा भील जिन्होंने सन'1857  में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया था ,, मध्यप्रदेश के एक ऐसे ही जननायक भगवान क्रन्तिकारी टंट्या भील जिन्होंने अंग्रेजों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया ,था,,
टंट्या भील के सामने ब्रिटिश शासन की ईंट से ईंट बज गए थी ,, मालवा की माटी से लेकर , निमाड़ के हर घने जंगल के ज्ञाता कहे जाने वाले टंट्या भील के सामने अंग्रेजों के सिपाहियों की कोई औकात नही थी कि टंट्या भील को पकड़ सकें,,
टंट्या भील एक ऐसे योद्धा थे ,, जिन्होंने एक दिन में 1500 सो से 2000 हजार तक सभाए की थी या कर सकते थे,,,,
अंग्रेजी हुकूमत टंट्या भील के नाम से ही थर थर काँपते थे,, उनको हर पल यह डर सताया करता था कि कहि टंट्या भील इधर से या उधर से तो नही आ रहा है ,,
भगवान क्रांतिकारी टंट्या भील की इतनी बड़ी शख्सियत थी कि उनके एरिये में या उनके आस पास के राज्य के लोग भी उनके नाम से चोरियां ,, या ,, डकैती तक करना छोड़ देते थे,, उनको भी यह डर था ,, की टंट्या भील के सामने हमारी कोई ओकात नही ,, डाकुओं के लिए डाकू ,, चोरो के लिए चोर ,, सवकारो के लिए साहूकार साबित होते थे ,, टंट्या भील अपने माथे पर गोफन हाथ मे बंदूक लेके चलते थे ,,
एक दिन ने 700 सौ से 800 सौ किलोमीटर तक उनका घूमना फिरना होता था ,,
उनकी चाल सुनते ही लोगो को डर लगने लगे जाता था ,,
टंट्या भील की चाल के हिसाब से भी प्रकृति भी अपना रुख बदल लेती थी ,, वह भी टंट्या भील की चाल के हिसाब से उनजे साथ चलती थी ,,
टंट्या भील ने कभी भी गरीब असहाय लोगों को परेशान नही किया ,,
राजा महाराजा भी उनके नाम से काँपते थे ,,
राजाओं के महल में जो रखा धन टंट्या भील रातो रात लूट लिया करते थे,, ओर उस धन को गरीब असहाय लोगों में बाट दिया करते थे,,
लोग उनको दया की मूर्ति कहकर पुकारते थे,, ,,
आदिवासी समुदाय में जन्मे 1840/42 खंडवा इंदौर जिले में ओर मत्यु -1890 में जबलपुर के जेल में फांसी की सजा या आज तक किसी को भी नही मालूम कि उनकी मित्यु कैसे हुई ,,
उनकी लाश पातालपानी महू इंदौर ,,में दफनाई गई ,, या ,, जलाई गई ,,
आज भी उनकी समाधि पातालपानी पर उनकी समाधि स्थल पर ट्रेन रुककर सलामी देती हैं ,,
वरना पातालपानी के जंगल को पार भी नही कर पाती हैं,,
कहते हैं टंट्या भील की मित्यु का कारण उनकी मुँह बोली बहन ओर उनके जियाजी ही हैं ,, जब वे राखी बंधवाने अपनी बहन के घर गए तभी उनको वहां धर दबोज लिया गया ,,
ओर वहां से सीधा अंग्रेजों के आदेशानुसार उन्हें जबलपुर के जेल में भेज दिया गया ,, वहां से सीधा उनकी लाशही पातालपानी के समीप जंगलों में पाई गई ,, जहा उनकी लाश को दफनाया या जलाया गया ,,
अंग्रेज आज भी इंग्लैंड में टंट्या भील को रोबिनहुड़ के नाम से ही पुकारती है ,, अंग्रेजों के हर वक्त ये डर सताया करता था कि आदिवासी भगवान टंट्या भील पलक झपकते गायप ,, हो जाते ते ,,आंख खोलते उनकी आंखों के सामने होते थे,,
कई बार अंग्रेजों ने टंट्या भील को बंदूक की गोली से छन्नी छन्नी कर दिया था ,, फिर भी टंट्या भील का एक बाल तक नही उखाड़ सके थे,,
आज भी टंट्या भील को क्रन्तिकारी भगवान कहते है उनके वंशज ,, उनकी पूजा करते हैं ,,
उनकी समाधि पातालपानी ने उनके सिर गाते को आज भी लोग पूजा अर्चना करते हैं ,, ओर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं ,,
कार्यक्रम में.  शरद कनेल, राहुल चौहान, मोंटी राणा, राहुल भवेल, सुखदेव सोलंकी, सुमेर सर, प्रिंस मंडलोई एडवोकेट, गोलु मंडलोई,  बंसिलाल बेनल, गलसिह भवेल, देवा भाभर, विकास बर्मन, रोहित,  गुलाब सिह मेड़ा, बलराम कनेल, मंगल कनेल नानुराम कनेल निहाल सिंह मेडा,  भेरू कनेल, देवीसिंह चोहान, डा, सत्यनारायण सोलंकी,मदन मंडलोई, सेठी दादा खंडलाई व आदि समाज जन  व जयस कार्यकर्ता उपस्थित थेl


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