भोपाल~बांसुरी में खोखले बांस से संगीत का सर्जन संभव है ~शशि दीप~~

भोपाल सैयद रिजवान अली~~

जैसा कि सभी जानते ही होंगे कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो मूल शाखाएं कर्नाटक संगीत जिसका संबंध दक्षिण से है और हिंदुस्तानी संगीत जो उत्तर भारत का संगीत है, में अलग-अलग राग होते हैं। ये राग स्वरों से बंधे होते हैं, कुछ रागों में 4 स्वर होते हैं, कुछ में 6 या 7 स्वर होते हैं, लेकिन प्रत्येक राग एक सीमित स्वर समूह को ही कहा जाता है जिसमें स्वरों के उतार-चढ़ाव और उनके मेल में बनने वाली रचना सुनने वाले को मुग्ध कर दे। लेकिन जरा सोचिए संगीत में राग और स्वर की सीमित संख्या व मानकीकृत होने के बावजूद हमें देश-विदेश में असीमित अनेकों प्रकार के संगीत देखने, सुनने को मिलते हैं। इसका कारण यही समझ में आता कि एक दक्ष संगीतकार अपने नैसर्गिक कुशलता व नवोन्मेष से भव्य, मनोरम व मंत्रमुग्ध कर देने वाले अनगिनत संगीत सृजन कर सकता है और उसकी तत्वदर्शिता समझकर उसे विपुल व जीवंत बनाने के साथ ही साथ विस्तीर्ण भी कर सकता है। बस यही गूढ़ सच्चाई प्रत्येक कला पर लागू  होती है, और यही बात हर एक के जीवन में भी प्रयोज्य है। जैसा कि सभी जानते ही हैं कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में भिन्न-भिन्न अनुग्रह होते हैं। कोई किसी बात में समृद्ध हैं तो कोई किसी और बात में। कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि हर व्यक्ति के जीवन में कई संसाधनों/सत्वों की सीमा होती है लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि जो भी है, जैसा भी है उसे जी ईश्वर की कृपा  समझ कर उससे एक सार्थक, सफल, संतुष्ट व खुशहाल जीवन का निर्माण करें।
जैसे अनुशासित व खुशनुमा वातावरण रखने से एक छोटे से घर को अव्यवस्था मुक्त रखा जा सकता है, सीमित इनकम को सुविचारित योजनाओं में निवेश किया जा सकता है, सीमित कपड़ों को अच्छे अवसरों के अनुसार अच्छी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। सीमित खाद्य पदार्थों को सचेतन ढंग से खाया जा सकता है और साधारण संसाधनों से अपने इनोवेशन के बल पर कई व्यंजन तैयार किए जा सकते हैं बशर्ते कोई कुशल और आत्मविश्वास से भरा हो। इसी तरह से कई स्पेशल नीड्स वाले बच्चों को या धीमी गति से समझने वालों को भी प्रोत्साहित करके उनमें छुपी प्रतिभाओं को निखारा जा सकता है व पूर्ण क्षमता तक आवर्धीत करने का प्रयास किया जा सकता है। इस प्रकार कुदरती अनुग्रहों को कुशलतापूर्वक उपयोग कर सीमित से असीमित कर पाना ही वास्तव में जीवन को ठीक ढंग से जीना है। और यह बिल्कुल सम्भव है क्योंकि यदि स्वरों से बंधे राग के साथ बांसुरी में एक खोखले बांस से उदात्त संगीत का सृजन करना संभव है, तो स्वर की समता के लिए उपलब्धता के भीतर रचनात्मक बनना भी संभव है। न की परिसीमा के बहाने कर्कश ध्वनि बनायें फिर विधाता को कोसें और स्वयं व सृष्टि के लिए अपने अस्तित्व को निरर्थक साबित करें। उक्त बात विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार महाराष्ट्र मुंबई की शशि दीप ने एक मुलाकात में हमारे संवाददाता से कहीं।


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