भोपाल~हिंसा के बारे में लिखना कोई अपराध नहीं है-सुप्रीम कोर्ट~~

त्रिपुरा हिंसा सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार के ट्वीट्स के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगाई

भोपाल सैयद रिजवान अली~~

भोपाल। विगत जिस प्रकार सम्पूर्ण देश में पत्रकारिता और पत्रकार बिरादरी को पुलिसिया कार्यवाही का सामना करना पउ रहा है उससे कोई अनभिज्ञ नही है। सरकारों ने जिस प्रकार पत्रकारों को सच्चाई उजागर करने के बदले प्रताडित किया वह किसी से छिपा नही है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाली पत्रकारिता पिछले 07 वर्षो के समय में विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में सरकारों के टार्गेट पर रही उसकी घटनाऔं से निःसन्देह देश में भय व आतंक का वातावरण कायम हुआ वह चिन्तनीय रहा। सबसे दुर्भाग्य का विषय रहा कि केन्द्र सरकार की खामोशी ने यह बिना प्रमाण के साबित कर दिया कि वर्तमान समय में पत्रकारिता के चौथे स्तम्भ का लहूलुहान करना का अपराध सरकारों के द्वारा किया गया।
              विगत कई माह पूर्व त्रिपुरा में जिस प्रकार सरकार द्वारा सुनियोजित साम्प्रदायिक दंगो के बाद अधिवक्ताऔ पत्रकारों द्वारा सच को उजागर करने के बदले यूएपीए कानून की आड में घेरने का प्रयास किया गया वह भी किसी से छिपा नही है। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा जिस प्रकार न्याय की गरिमा को बचाकर त्रिपुरा सरकार को हशिया पर लाया गया वह प्रशंसनीय है। वर्तमान संदर्भ में हम सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि हिंसा के बारे में लिखना कोई अपराध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था ने देश भर के पत्रकारों को अभयदान दिया जो सरकार की नीतियों की खामियों को उजागर करते हैं । इसी प्रकार देश भर में सरकारों या राजनीतिक दलों के संरक्षण में हुई हिसंक घटनाऔं पर लिखकर जनमानस को हकीकत से रूबरू करने वाले पत्रकारों पर भय व आतंक के छाये बादलों कां छांटने की व्यवस्था ने पत्रकारिता को आक्सीजन देने का काम किया है।

गौरतलब हो कि गत दिनों त्रिपुरा पुलिस ने पत्रकार समीउल्लाह शब्बीर ख़ान के ख़िलाफ़ राज्य में पिछले साल हुई हिंसा से संबंधित एक ट्वीट के लिए यूएपीए और विभिन्न धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज किया था । सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को त्रिपुरा पुलिस की साइबर सेल को राज्य में पिछले साल हुई हिंसा को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता.पत्रकार समीउल्लाह शब्बीर खान द्वारा किए गए ट्वीट्स पर आगे कार्रवाई करने से रोक दिया है।

गौरतलब है कि पुलिस ने ट्विटर को नोटिस भेजकर संबंधित ट्वीट्स हटाने को कहा था और खान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जांच के उद्देश्य से उनके आईपी एड्रेस व फोन नंबर की जानकारी मांगी थी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार मामले की सुनवाई जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ और एएस बोपन्ना की पीठ कर रही थी फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा हिंसा के बारे में लिखना कोई अपराध नहीं है।



गौरतलब है कि 22 नवंबर 2021 को त्रिपुरा पुलिस की अपराध शाखा के पुलिस अधीक्षक कार्यालय साइबर अपराध ने यूएपीए और भारतीय दंड संहिता आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामलों का उल्लेख करते हुए ट्विटर से संपर्क साधा था।

उसने त्रिपुरा हिंसा के बाद कुछ पत्रकारों सामाजिक कार्यकर्ताओं या बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए ट्वीट्स को हटाने और संंबंधित ट्विटर खातों से एक निश्चित अवधि में पोस्ट की गई सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए ट्विटर से कहा था।

साथ ही इन ट्विटर खातों की जानकारी जैसे. इनसे जुड़े ईमेल एड्रेस मोबाइल नंबर ब्राउजिंग हिस्ट्री और उन डिवाइस का आईपी एड्रेस मांगा गया था जिनसे इन खातों को संचालित किया गया था सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 22 नवंबर 2021 की इस कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

रिट याचिका दाखिल करते हुए याचिकाकर्ता की वकील शाहरुख आलम ने पुलिस के विवादित नोटिस पर रोक लगाने की मांग करते हुए इसे निजता पर हमला करार दिया था।याचिका में गुहार लगाई गई थी कि याचिकाकर्ता सामाजिक तौर पर एक जागरूक छात्र है।
पत्रकार सुरक्षा एंव कल्याण के लिये प्रतिबद्ध अखिल भारतीय संगठन प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स पंजीकृत के संस्थापक अध्यक्ष सैयद खालिद कैस ने देश में पत्रकारिता पर हो रहे हमलों पर चिन्ता व्यक्त करते हूए माननीय सुप्रीम कोर्ट का आभार जताया ।


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