*दिनांक 30 मई को शनि जयंती एवं वट सावित्री व्रत पर 30 वर्ष बाद बन रहा अद्भुत संयोग* *डाँ.अशोक शास्त्री*~~

          शनि जयंती एवं वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनि  जयंती एवं वट सावित्री व्रत किया जाता है । इस संदर्भ मे मालवा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाँ.अशोक शास्त्री ने एक विशेष मुलाकात मे बताया की इस दिन शनि देव का जन्म हुआ था । तभी से यह दिन शनि जयंती के रूप मे मनाया जाता है । इस दिन शनि का व्रत करने के साथ विधि - विधान से शनि देव की उपासना करते है । शनि देव को कोणस्थ , पिंगल , बभ्रु , रौद्रांतक , यम , सौरि , शनैश्चर , मंद , पिप्पलाश्रय , के नाम से भी जाना जाता है । इस दिन विशेष उपाय करने से शनि दोष का भी निवारण होता है । इस बार शनि जयंती सोमवार 30 मई को मनाई जाएगी । शनि जयंती पर इस बार एक विशेष संयोग भी बन रहा है ।
          डाँ.अशोक शास्त्री के मुताबिक शनि जयंती पर 30 वर्ष बाद अद्भुत संयोग बन रहा है । शनि जयंती के दिन सोमवती अमावस्या और वट सावित्री का त्योहार भी बनाया जाएगा । ऐसा संयोग 30 वर्ष बाद बन रहा है । इस दिन शनि देव कुंभ राशि मे रहेंगे और सर्वार्थ सिद्ध योग व सुकर्मा योग भी बन रहा है । इस दिन प्रातः 07:19 से सर्वार्थ सिद्ध योग आरंभ होकर 31 मई को प्रातःकाल 05:16 बजे तक रहेगा ।
          डाँ.अशोक शास्त्री के अनुसार शनि जयंती पर शनि की पूजा का विशेष महत्व है । सुबह स्नान कर शनि देव की मूर्ति पर तेल , पुष्प , नैवेद्य अर्पित करे । उनके चरणों मे काली उडद और तिल अर्पण करे । बाद तेल का दीपक जलाकर शनि चालिसा एवं शनि मंत्रों का जप करे  और व्रत का संकल्प ले । किसी निर्धन व्यक्ति को भोजन कराना बहुत फलदायक माना जाता है । दान धर्म करने से भी जीवन के कष्ट दूर होते है ।
          डाँ. शास्त्री के मुताबिक आमतौर पर लोगों मे शनि के डर देखने मे आता है । एसी अनेक धारणाएँ बनी हुई है कि शनि केवल खराब फल देता है परन्तु यह सत्य से परे है । शास्त्रों के अनुसार शनि व्यक्ति के कर्मों के अनुसार सजा तय करते है
शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या मनुष्यों के कर्म अनुसार ही उसे फल देती है ।
           डाँ. शास्त्री के मुताबिक शनि ग्रह लंबी बीमारी , विपत्ति , ऐश्वर्य , मानसिक चिंता , धोखा , छलकपट , राजनेता , तांत्रिक , पुलिस , विस्फोटक सामग्री , लड़ाई - झगडे , कोर्ट - कचहरी इत्यादि के कारक ग्रह होते है । शनि ग्रह से ही ज्ञात होगा कि जातक अपने जीवन मे कितना सफल होगा और कितना दुख झेलेगा और उसका समाज मे कितना मान सम्मान मिलेगा ।
          ऐसे जातकों को इन शनि मंत्रों का विधि अनुसार जाप करना चाहिए।
।।  ऊँ शं अभयहस्ताय नमः ।।
।।  ऊँ  शं शनैश्चराय नमः  ।।
।।  ऊँ  निलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजं छायामार्त्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्  ।।
          डाँ.अशोक शास्त्री के अनुसार धार्मिक ग्रंथों मे बहुत कारगर , प्रभावशाली उपाय बताए गए है । जिसका यदि उचित तरीके से प्रयोग किया जाए तो उपरोक्त जितनी भी समस्याएँ बताई गई है उसमे अवश्य ही आराम मिलता है व शांति महसूस होती है ।
          डाँ.अशोक शास्त्री ने बताया कि शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सबसे पहले किसी भी प्रकार के गलत कार्य नही करे , यदि करते हो तो उसे तत्काल बंद करदे । जैसे झुठ बोलना बंद कर दे , अपना व्यवहार अच्छा करे  , अतिथि देवो भव मे विश्वास रखे , पत्नी की इज्जत करे , शराब एवं व्यसनों से दूर रहे , अनैतिक कार्य बचे  , झूठी गवाही नही दे , मजदूर की इज्जत करे एवं उनका उचित मेहनताना दे , शनि ग्रह लेबर मजदूर के भी कारक ग्रह माने गए है ।
              *वट  -  सावित्री  व्रत*
          ज्योतिषाचार्य डाँ.अशोक शास्त्री ने आगे वट सावित्री व्रत के बारे मे बताया की वट सावित्री व्रत प्रति वर्ष  ज्येष्ठ कृष्ण की अमावस्या को मनाई जाती है । इस दिन महिलाएं व्रत रख वट वृक्ष की पूजा करती है । ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएं इस दिन वट सावित्री व्रत रख कर विधि विधान से पूजन करती है उन्हे अखंड सौभाग्य का फल प्राप्त होता है और पति की लंबी आयु प्राप्त होती है ।
           इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य  के लिए व्रत रखती है । वट वृक्ष की विधि विधान से पूजा परिक्रमा कर पति के जीवन मे आने वाली समस्याओं को दूर करने की प्रार्थना करती है । धार्मिक मान्यतानुसार वट वृक्ष ( बरगद ) के नीचे बैठकर पूजा करने और रक्षा सूत्र बांधने से पति की आयु लंबी होने के साथ हर मनोकामना पूर्ण होती है ।
          डाँ.अशोक शास्त्री के मुताबिक वट वृक्ष मे ब्रह्मा , विष्णु और महेश तीनो देवता का वास है । इसलिए वृक्ष की पूजा करने से सुख - समृद्धि और स्वास्थ्य अच्छा रहता है । वही बरगद के वृक्ष पर हर समय लक्ष्मी का वास होता है । इतना ही नही बरगद के पेड से लटकती हुई जडों को सावित्री के रुप मे माना गया है । कहा जाता है कि  मार्कण्डेय ऋषि को भगवान विष्णु ने बरगद के पत्ते पर ही दर्शन दिए थे । ऐसी मान्यता है कि इसलिए बरगद के वृक्ष की पूजा करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है ।
          डाँ.अशोक शास्त्री ने बताया कि वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान पश्चात् वट वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति स्थापित कर विधि अनुसार पूजन कर जल चढाए । साथ कच्चे सूत से वट वृक्ष की सात परिक्रमा करते हुए बांध दे । अब महिलाएं सावित्री - सत्यवान की प्रतिमा के सामने रोली , अक्षत , भीगे चने , कलावा , फल , फूल अर्पित करे ।
          डाँ. शास्त्री के अनुसार वट सावित्री के दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व है । अनेक स्थानों पर इस दिन सास को बायना देने की भी परंपरा है । कहा जाता है कि इस दिन सास को खाना , फल , कपडे , आदि का दान भी बहुत शुभ होता है ।इसके अलावा अपनों से बडे को भी दान दिया जाता है । हाथ का पंखा , खरबूजा , और आम का दान भी दिया जाता है । ( डाँ.अशोक शास्त्री )


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