झाबुआ~इस वर्ष 131 नए बच्चे अति कुपोषित मिले जो पिछले वर्ष से 20 फीसदी  अधिक~~

स्थिति चिंताजनक-आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों को पोषण आहार देने के बावजूद स्थिति नहीं सुधर रही,कुपोषण का बढ़ता जा रहा ग्राफ~~

झाबुआसंजय जैन~~

सरकार प्रदेश को कुपोषण मुक्त करने के लिए सालाना लाखों रुपए खर्च कर रही है। इसके बावजूद स्थिति चिंताजनक है। जिले में कुपोषित बच्चों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनवाड़ी केंद्रों पर कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में इन्हें कुपोषण से बाहर करने के प्रयास किए जाते हैं। इसके बावजूद इस वर्ष 20 फीसदी मामले बढ़े है।



 
पिछले वर्ष से 20 फीसदी अधिक,जो प्रयास किए जा रहे हैं वह नाकाफी ........
जिला कुपोषण की स्थिति सुधारने के जो प्रयास किए जा रहे हैं वह नाकाफी है। जिला अस्पताल के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष 720 अति कुपोषित बच्चे मिले थे। जिन्हें स्वास्थ्य केंद्र पर भर्ती कर उपचार किया। इस वर्ष 131 नए बच्चे अति कुपोषित की श्रेणी में चिह्नित हुए,जो पिछले वर्ष से 20 फीसदी अधिक है। इससे आंकड़ा बढ़कर 851 पर पहुंच गया। सामान्य कुपोषित बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र पर ही पोषण आहार उपलब्ध करवाया जाता हैं। विभाग में वित्तीय वर्ष की गणना अनुसार वर्ष 2020-21 में 841,वर्ष 2021-22 में 720 तथा वर्ष 2022-23 के दो माह में 131 बच्चे अति कुपोषित मिले हैं।





 





 जांच केवल खानापूर्ति तक सिमट कर रह गई........





जिले में कुल 1902 आगनबाड़ी केंद्र व 804 मिनी आंगनबाड़ी केंद्र यानि कुल 2706 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। केंद्र व राज्य सरकार से हर साल करोड़ों का बजट मिलने के बाद भी आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत बदतर है। गंभीर बात यह है कि जिलेभर की 50 प्रतिशत से अधिक आंगनबाड़ियों में वजन मशीनें ही नहीं हैं। जहां मिली थीं,वह खराब हो गईं। यही नहीं अधिकतर आंगनवाड़ी केंद्र किराए के भवनों में संचालित हैं,जिसमें न तो नल कनेक्शन हैं ना ही बिजली का कनेक्शन। लेकिन यह जिम्मेदारी इन अफसर व कर्मचारियों के लिए चुनौती बन गई है। जांच केवल खानापूर्ति तक सिमट कर रह गई है। 





 





चिह्नित कर स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जाता है.........
आंगनवाड़ी केंद्रों पर प्रति माह 11 से 20 तारीख तक बच्चों को वजन होता हैं। इसमें लंबाई अनुपात में बच्चे का वजन कम या अति कम होने पर उन्हें चिह्नित कर स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जाता हैं। जहां परीक्षण के बाद मां व बच्चे को 14 दिन रखा जाता हैं। पर्याप्त मात्रा में पोषण आहार दूध,मूंगफली और शक्कर के मिश्रण से बना पाउडर,मां को प्रतिदिन 120 रुपए दिए जाते हैं। कुपोषित बच्चें को केंद्र पर लाने वाली आशा कार्यकर्ता को प्रति बच्चे 100 रुपए प्रोत्साहन राशि मिलती है। बच्चें को पौष्टिक आहार के साथ अन्य बीमारियों की जांच की जाती है। ब्लड की कमी होने पर ब्लड चढ़ाया जाता हैं। अन्य बीमारी पर इलाज भी किया जाता हैं। संतुलित पौष्टिक आहार की कमी के कारण कई बच्चे जन्म से ही कुपोषित होते हैं।




जागरूकता की कमी......
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी है। जन्म के एक घंटे के अंदर बच्चे को मां दूध पिलाना जरूरी होता है। जिससे बच्चा कमजोर न रहे और कुपोषण का शिकार न बने। छह माह बाद बच्चे को प्रोटीन युक्त डाइट देनी चाहिए। कोरोना के बाद से गंभीर कुपोषित को ही सुधार केंद्र पर रखा जा रहा हैं। 

कुपोषण बढ़ने के कारण .......
-जन्म के बाद एक घंटे के भीतर व 6 माह तक नियमित स्तनपान नहीं करवाना।
-6 माह बाद पूरक आहार शुरू नहीं करना। -
-साफ. सफाई का ध्यान नहीं रखना।
-बच्चे को जन्म से किशोरावस्था तक सभी टीकाकरण नहीं करवाना।
- किशोर अवस्था से पूर्व अपर्याप्त मात्रा में भोजन देना।
-कुछ अभिभावक अंधविश्वास के चलते बच्चे को समय पर स्तनपान नहीं करवाते।
-बच्चा अधिक बीमार होने पर भी समुचित उपचार नहीं करवाना।




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