झाबुआ~शास्त्रों का श्रवण भव सागर से पार कराता हेै,आत्म बोध बिना केवल्य ज्ञान के नही हो सकता है, -हमे जड़ और चेतन का भेद भी शास्त्र ही करा सकते हेै -पूज्य निपूण रत्नजी मसा.~~

श्री राजेंद्र सूरी पौषधशाला में चातुर्मास में बह रही ज्ञान की गंगा~~


झाबुआ । श्री राजेंद्र सूरी पौषधशाला , श्री ऋषभदेव बावन जिनालय मे चातुर्मास हेतु विराजित पुण्य सम्राट पूज्य जयंतसेन सूरीश्वरजी म सा के पट्टधर पूज्य आचार्य श्री नित्यसेन सूरीश्वरजी म सा आदि ठाणा 14 एवं पूज्य साध्वी श्री विद्या गुणा श्रीजी और रश्मि प्रभा श्रीजी की पावन निश्रा मे 15 जुलाई शुक्रवार  को प्रतिदिन वाचन हेतु योग सार ग्रंथ और जम्बूस्वामी शास्त्र के लाभार्थी परिवार द्वारा वोहराया जायेगा । चातुर्मास समिति अध्यक्ष मुकेश जैन नाकोंडा और सचिव भारत बाबेल ने बताया कि ग्रंथ और शास्त्र लाभार्थी परिवार कमलेश कोठारी और श्री प्रदीप कटारिया के निवास स्थान से लेकर श्री संघ के साथ बाजे गांजे के साथ राजेन्द्र सूरी पौषधशाला पहुंचेगा । यहाँ ग्रंथ की पूजन आरती के पश्चात पूज्य आचार्य श्री नित्यसेन सूरीश्वरजी म सा को वोहराया जाएगा । आज रात्रि में जिनालय मे चौबीसी का आयोजन लाभार्थी परिवार ने किया ।
आज पूज्य मुनिराज निपुण रतन विजयजी म सा ने शास्त्रों का विस्तार से महत्व समझाया । उन्होने बताया कि शास्त्र परमात्मा के वचन होते हैं और उनके वचन सुने बिना मोक्ष संभव नहीं है । शास्त्र जीवन का अनुशासन और आत्मा की रक्षा करने में सहायक होता । आत्मबोध बिना कैवल्य ज्ञान के नही हो सकता है,किंतु ज्ञानियों ने बताया कि शास्त्रों का बोध कर भी हमे आत्मबोध हो सकता है। यदि शुध्द आत्मा को प्रकट करना हैे तो शास्त्र ज्ञानी हमारे लिये उपयोगी होंगे । हमे जड़ और चेतन का भेद भी शास्त्र ही करा सकते हेै । जीवन मे मूल दुख का कारण अपेक्षा , इच्छा , तृष्णा है,े वह सभी शास्त्रों का श्रवण करने से दुर हो सकते हे ।  500 आचार्यों ने भगवान की वाणी को शुध्द लेखन कर शास्त्रों मे निहित किया हेै । इक्कीस हज़ार वर्ष का चलने बाला वर्तमान शासन भी शास्त्रों के आधार पर ही चल रहा है । शास्त्र का ज्ञान नही होने से हम जो हमारी दृष्टि से देखते है,े उसे ही सही मान लेते हेै और सत्य असत्य का बोध नही हो पाता हेै । साधु भगवत , ज्ञानी जो भी अपने जीवन में कर रहे हेै, शास्त्र के आधार पर ही कर रहे हेै । शास्त्र के आधार पर चलने वाले जीव कभी भी अहंकारी नही होते है । अभी हम लौकिक ज्ञान में उलझे हुए हैं जबकि आत्मा का बोध लोकोत्तर ज्ञान से हो सकता है,े जो हमे शास्त्र ही दे सकते है । जीवन मे हमे समता को धारण करना होगा । समता आ जाती हेै तो संतोष आ जाता हेै और संतोष से इक्छा का अंत हो जाता है, जो समस्त दुखों की जड़ है। यदि जीवन मे संतोष होगा तो लक्ष्मी भी स्वतः आ जाती है । योग सार ग्रंथ एक निर्लेप साधक द्वारा रचित है, जिसमें लेखक ने अपना नाम तक नहीं लिखा । ज्ञान और क्रिया दोनो साथ होगी तो ही हम मोक्ष रूपी मंजिल तक पहुँच सकते है ।




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