क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

कवि —आर. आर. प्रिंस

सब का किया कल्याण
कल्याण स्वरूप, शंकर है।।
जिसे पूजे अब तक माँ
पिता वैसे, षिवाप्रिय है।।
कृपानिधि हैं, शम्भू हैं।
त्रिलोकेष, वही तो भक्तवत्सल हैं।।
पषुपति हैं तारक वो।
संघर्ष करते नायक वो।।
महादेव को, कभी देखा नहीं है।
क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

दुखों, तकलिफों के सर्वज्ञ है।
ललाट मे आँख है, ललाटक्ष हैं।।
अत्यंत हैं, मजबूत देह वाले।
भीम हैं, भयंकर रूप वाले।।
प्रजापति हैं, पालन हार हैं।
हरी हैं, रूद्र हैं, स्वयं प्रकाष रूप हैं।।
परमेष्वर हो तेरे कई रूप
मानवरूपी हैं, महादेव पिता।।
महादेव को, कभी देखा नहीं है।
क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

कष्टों को नष्ट है किया।
श्रीकण्ठ मे विष भी लिया।।
पर्वतों के स्वामी नहीं हैं।
गिरीप्रिय, कहलाते हैं पिता।।
सर्व समर्थ ऐष्वर्य संपन्न क्या है।
फटे हाल, माला माल रहते सदा।।
आकाश रूपी बाल वाले।
सिधी-साधी चाल वाले।।
महादेव को, कभी देखा नहीं है।
क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

शाष्वत धर्म जानते हैं।
सबको अपना मानते हैं।।
अनेक रूप धारण हैं।
कहते लोग साधारण हैं।।
विष्व के ईष्वर हारे हैं।
पिता ही तो विष्वेष्वर हैं।।
उमा पति हैं, सोम वो।
मेरे अंग-अंग हैं, रोम-रोम वो।।
महादेव को, कभी देखा नहीं है।
क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

शिव जैसे हैं, शूलपाणी।
पिता मेरे हैं, जटिल प्राणी।।
कालों के भी काल हैं।
मेरे लिए महाकाल हैं।।
जगत्व्यापी, दिगम्बर, सात्विक हैं।
परिस्थिति अनुसार, गुणों के स्वामी हैं।।
अत्यंत उग्र, रूप वाले।
भोले हैं पिता, त्रिनेत्र वाले।।
महादेव को, कभी देखा नहीं है।
क्यों न कहुँ? हर हर पिता महादेव।।

कवि —आर. आर. प्रिंस
जिला बड़वानी


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