झाबुआ~समस्त कर्मों से छूटने पर मनुष्य को मोक्ष की होती है प्राप्ति ~प्रवर्तक पूज्य जिनेन्द्र मुनिजी`~~

झाबुआ। स्थानक भवन में चातुर्मास अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में 19 जुलाई मंगलवार को पूज्य जिनेन्द्र मुनिजी ने फरमाया कि जिनेश्वर देव का शासन प्रवृत्तमान है। आज कई भव्य आत्माएं श्रेष्ठ धर्म-आराधनाएं कर रहीं है। तीर्थंकर भगवान इस भव में नहीं है, किन्तु साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाएं आराधना कर रहे है। भगवान के वचनों और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर जीव सभी कर्मों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। भरत, ऐरावत क्षेत्र में भी तीर्थंकर नहीं है, पर श्रावक-श्राविकाएं साधु-साध्वी वहां भी आराधनाएं कर रहे है।
मुनि श्री ने आगे बताया कि महाविदेह क्षेत्र में 32 विजय है, उनमें 20 तीर्थंकर विराजित है। वहां भी साधक आराधनाएं कर रहे है। वहां महाज्ञानी केवली भगवान विराजमान है, वे शंकाओं का समाधान करते है। यहां भी भगवान के वचनों पर श्रद्धा के कारण आज आराधनाए हो रही है। आज हमे सौभाग्य से गुरू मिले है, वे जीव को सन्मार्ग बताते है। आपने कहा कि निग्रंथ प्रवचन में भगवान द्वारा बताया गया मार्ग श्रेष्ठ है, जीव को इसकी कीमत समझना है। इस मार्ग पर चलने के लिए स्वयं को पुरूषार्थ करना पड़ेगा। संसार रूपी जंगल से निकलने का यह मार्ग निग्रंथ प्रवचन है।
संसार 4 प्रकार के है
जिनेन्द्र मुनिजी ने बताया कि संसार 4 प्रकार के होते है - नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवलोक। इस संसार में भ्रमण करते.करते जीव को अनंतकाल हो गया है, पर अभी तक सहीं मार्ग मनुष्य को नहीं मिल पाया है। कुछ व्यक्ति ना समझी के कारण यह प्रश्न पूछते है कि भगवान द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर यदि सभी व्यक्ति मोक्ष में पहुंचे जाएंगे, तो संसार में क्या कोई भी नहीं रहेगा ... ?, जयंती श्राविका ने भी यह प्रश्न पूछा था कि भव्य जीव सभी मोक्ष प्राप्त करेंगे क्याए कोई भी नहीं बचेगा क्या .... ? भगवान ने कहा कि ऐसा नही होता है जीव अनंत है। भव्य-अभव्य जीव है। अभव्य जीव कभी भी इस संसार से पार नहीं हुए है। वे मोक्ष में नहीं जा सकते है। भव्य जीव ही 10 बोल की प्राप्ति होने पर ही मोक्ष में जा सकते है
संयम का पालन करने पर आत्मा मोक्ष को प्राप्त करती है
मुनि श्री ने समाजजनों को बताया कि मोहनीय कर्म जिसके मंद पड़े है, उसको इस संसार से निकलने का मन होता है। संसार जल रहा है, जिस आत्मा को इसका भान हो जाता है, वहीं आत्मा इस संसार से बाहर निकल सकती है। भगवान द्वारा बताया गया मार्ग ही जन्म-मरण से छुटकारा दिलाने वाला सहीं मार्ग है। भगवान ने जितनी सूक्ष्मताए बारिकी से यह मार्ग बताया है, वह मार्ग और कोई भी नही बता सकता है। संयम का पालन करने पर आत्मा मोक्ष को प्राप्त करता है। जिनेश्वर देव के शासन में ही पाप के त्याग की बात बताई गई है। सभी पापों का त्याग करने पर  मोक्ष की प्राप्ति होती है। सभी को तीन मनोरथ पूर्ण होने की भावना  भाना  चाहिएए जो कभी ना कभी पूर्ण फलीभूत होती ही है।
सुख की प्राप्ति के लिए जीव पाप करता है
अणुवत्स पूज्य संयत मुनिजी मसा ने अपने प्रवचन में बताया कि जीव को पाप अच्छे लगते है। वह सुख की प्राप्ति के लिए पाप करता है। असंयम की प्रवृत्ति पर नियंत्रण करना आवश्यक है। जिस प्रकार घोडा अनियंत्रित हो जाता हैए तो उसे लगाम से नियंत्रित करना पड़ता है। हाथी पागल हो जाता है तो उसे अंकुश से नियंत्रित करना पड़ता है ए उसी तरह भगवान ने भी साधकों के लिए लगाम बताई है। हमको भी असंयम और अहंकारी रूपी इस मन पर अंकुश लगाना है। समुद्र की लहरे रोकने के लिए जहाज पर पताका लगाई जाती हैए उसी तरह हमारे अंदर भी मोह रूपी झकोरे उठ रहे है, इस पर संयम की पताका लगाना पड़ेगी।
जीवन में संयम बरतना बहुत जरूरी
आपने कहा कि जीव को मोह प्रिय है। अनादिकाल से जीव मोह माया में लगा हुआ है। मोह पर नियंत्रण करना आवश्यक है, असंयम के आकर्षण को समाप्त करना पड़ेगा। जीव असंयम के प्रति जल्दी आकर्षित होता है। अभिनेताओं के फैशन पर आकर्षित होकर उनका अनुसरण शीघ्र कर लेता है। परंतु संयमी को देखकर संयम का मन बहुत कम को होता है। जीव को इन सभी से बचकर इनके आकर्षण को मिटाना है। संयम की ओर बढ़ने के उपाय अपनाने पर ही मनुष्य भवसागर से पार हो पाएगा। इस दौरान प्रवर्तक श्रीजी ने 22 जुलाई, शुक्रवार को मालव केसरी पूज्य सौभाग्यमलजी मसा की की पुण्यतिथि पर 20 से 22 जुलाई तक तेला तप, बेला, उपवास आदि तपस्या करने का समाजजनों से आव्हान किया। सभा का संचालन प्रदीप रूनवाल ने किया।        
तपस्या की लगी झड़ी
धर्मसभा में श्रीमती राजकुमारी कटारिया, राजपाल मूणत, श्रीमती सोनल कटकानी ने 11 उपवास, श्रीमती रश्मि मेहता ने 9 उपवास तथा 15 श्रावक श्राविका ने 8 उपवास के पच्चखान लिए। कु. आयुषी घोड़ावत की 9 तपस्या पूर्ण हुई। तेला, आयंबिल की लड़ी गतिमान है।


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