*बाकानेर~तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे*~~

भारत सरकार मोहम्मद रफी को भारत रत्न सम्मान दें~ सैयद रिजवान अली~~

बाकानेर ~प्रेस क्लब आफ वर्किंग जर्नलिस्ट कौमी एकता कमेटी परख साहित्य मंच द्वारा मोहम्मद रफी कि 43 की पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर श्रद्धांजलि खिराजे अकीदत पेश की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार विश्वजीत सेन डॉक्टर ओम जोशी जितेंद्र कानूनगो,सैयद रिजवान अली, सैयद अशफाक बबलू, कमल अंबेडकर ,काजी सैयद जुल्फिकार अली ,असलम खान पठान साबरी, शेख सरवर, अंतिम सेन, राजकुमार पंजाबी, आरिफ कुरैशी, मोहम्मद अमजद मंसूरी निमाड़ मालवा के प्रसिद्ध गायक शौकत मंसूरीआदि ने श्रद्धांजलि और खिराजे अकीदत पेश की वरिष्ठ पत्रकार सैयद रिजवान अली ने कहा 31जुलाई जब भी आती है तो इस दिन सिर्फ एक ही शख्सियत का चेहरा आँखों के सामने घूमता है और वो चेहरा है आवाज़ के जादूगर, मौसिक़ी के शहंशाह, गीतों के मसीहा, प्लेबैक-गायकों के बादशाह, द-लीजेंड, महान, अमर और दुनिया के सबसे बड़े गायक मो. रफी साहब का, ये वो शख्सियत है जिसके बिना संगीत की कल्पना भी नही की जा सकती और आज के ही दिन यानी 31 जुलाई 1980 को ये संगीत की दुनिया का सूरज हमेशा-हमेशा के लिए डूब गया था।

मो. रफी साहब का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को पंजाब के सुल्तान सिंह में हुआ था रफी साहब को गाने का शौक बचपन से था बचपन मे एक फकीर के गाने को रफी साहब गाया करते थे उनके बड़े भाई ने जब अपने छोटे भाई  रफी के गाने के शौक को देखा तो वो रफी साहब को संगीत के उस्तादों के पास संगीत की शिक्षा हासिल करवाने के लिए ले गए। इसके बाद लाहौर रेडियो स्टेशन में कुंदनलाल सहगल ने बिना माइक के गाने से मना कर दिया तो मो. रफी साहब ने उनके स्थान पर बिना माइक के लोगो के सामने गाया। लोगो को रफी साहब की आवाज़ बहुत पसंद आई और हज़ारो लोगो की भीड़ का शोर रफी साहब की आवाज़ के आगे थम गया। जब कुंदनलाल सहगल ने रफी साहब की आवाज़ सुनी तो रफी साहब को आशीर्वाद देते हुए सहगल ने कहा था एक दिन तुम मुझसे भी बड़े गायक बनोगे। कुंदनलाल सहगल की कही गई वो बात सच हो गई और मो. रफी साहब दुनिया के सबसे बड़े गायक बन गए।

रफी साहब का फिल्मी संगीत सफर 1944 में प्रदर्शित हुई एक पंजाबी फिल्म गुलबलोच से शुरू हुआ। लेकिन रफी साहब को पहली सफलता 1947 में रिलीज हुई फ़िल्म जुगनू के लता मंगेशकर के साथ गाए गाने "यहाँ बदला वफ़ा का बे-वफाई के सिवा क्या है" से मिली रफी-लता का ये गाना बहुत हिट हुआ था और रफी साहब की आवाज़ को लोगो ने नोटिस किया था ऐसे ही रफी साहब की गाड़ी चल रही थी रफी साहब को उस दौर में एक या दो गाने मिलते थे संगीतकार नोशाद के प्रिय गायक तलत महमूद और मुकेश थे नोशाद फ़िल्म के पूरे गाने दूसरे गायकों से गवाते थे और एक गाना रफी साहब से गवाते थे फ़िल्म अनमोल-घड़ी का सिर्फ एक गाना "तेरा खिलौना टूटा बालक" नोशाद ने रफी साहब से गवाया और वो ज़बरदस्त हिट रहा। मेहबूब खान की फ़िल्म अंदाज़ के पूरे गीत मुकेश ने गाये जो अभिनेता दिलीप कुमार पर फिल्माए गए थे और एक गाना लता मंगेशकर और रफी साहब ने गाया था जिसे नरगिस और राज कपूर पर फिल्माया गया था गीत के बोल थे "तेरी इसी अदा पे तो फिदा होते हैं" हिट रहा था इसके बाद दिलीप कुमार अभिनीत एक और सुपरहिट फिल्म मेला के सभी गीत मुकेश ने गए और एक गीत रफी साहब के हिस्से में आया और रफी साहब का गया गीत "ये ज़िन्दगी के मेले, दुनिया मे कम ना होंगे अफसोस हम ना होंगे" बाकी सभी गीतों पर भारी पड़ा था और इसी गीत को लोगो ने सबसे ज्यादा पसंद किया था। फिर भी रफी साहब को जो मुकाम मिलना चाहिए था वो नही मिल पा रहा था फिर 1952 में आई एक आइकॉनिक म्यूज़िकल फ़िल्म बैजू-बाबरा, इस फ़िल्म के गीतों ने पूरे देश मे तहलका मचा दिया था और रफी साहब की आवाज़ की दीवानगी लोगो पर सर चढ़कर बोल रही थी। नोशाद के संगीत से सजी बैजू-बाबरा के सभी गीत रफी साहब ने गाए और सारे गाने सुपरहिट साबित हुए, ओ दुनिया के रखवाले ने तो जैसे कहर ढा दिया था इतना लाउड और ऊंचे सुरों का गाना रफी साहब के अलावा आज तक कोई नही गा पाया। इसके अलावा दूर कोई गाए धुन ये सुनाए,/ तू गंगा की मौज में जमना का धारा/ झूले के पवन में आई बहार प्यार कर ले/ बचपन की मोहब्बत को दिल से ना जुदा करना और मन तड़पत हरि दर्शन को आज बहुत ज़बरदस्त हिट हुए थे इन गीतों के बाद फिर कभी रफी साहब ने पीछे मुड़कर नही देखा, एक युग और एकछत्र राज रफी के नाम का फिल्मी दुनिया मे स्थापित हो गया।

रफी साहब ने अपने दौर के लगभग सभी संगीतकारो के साथ एक से बढ़कर एक गीत गाकर उनके संगीत को अमर कर दिया। इनमें प्रमुख रूप से नोशाद, शंकर-जयकिशन, रवि, मदन मोहन, ओ-पी नैयर, सलिल चौधरी, चित्रगुप्त, एन दत्त, एस-एन त्रिपाठी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनदजी, रोशन, एस-डी बर्मन, आर-डी बर्मन, राजेश रोशन, जयदेव, खय्याम जैसे संगीतकार है जिन्होंने रफी साहब की आवाज़ का बखूबी इस्तेमाल किया। इसी तरह अपने दौर के हर बड़े और छोटे अभिनेताओं के लिए भी रफी साहब ने गाया इनमें दिलीप कुमार, राजकुमार, देवानंद, मनोज कुमार, शम्मी कपूर, सुनील दत्त, शशि कपूर, जॉय मुखर्जी, विश्वजीत, धर्मेंद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना, ऋषि कपूर, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, अनिल धवन, विजय अरोरा और अमिताभ बच्चन प्रमुख है इसके अलावा जॉनी वाकर के लिए भी रफी साहब ने उनकी स्टाइल के गीत गाए। मानो रफी साहब नही खुद जॉनी वाकर गा रहे हो। अभिनेता शम्मी कपूर तो अपने लिए किसी दूसरे गायक को पसंद ही नही करते थे उनकी शर्त होती थी मेरी फिल्मों में मेरे लिए सिर्फ रफी साहब ही गाएंगे। रफी साहब की कुछ महतवपूर्ण फिल्में जिनके गीत खासे लोकप्रिय हुए उनमें, बैजू-बाबरा, आन, अमर, दीदार, कोहिनूर, नया दौर, मदर-इंडिया, दोस्ती, जंगली, राम और श्याम, ब्रह्मचारी, जब जब फूल खिले, जीने की राह, मेरे सनम, दो रास्ते, दूर की आवाज़, तीसरी-मंजिल, मेरा साया, ताजमहल, शागिर्द, प्रोफेसर, काजल, हम दोनों, काला, बाज़ार, तेरे घर के सामने, आओ प्यार करे, प्रिंस, यादों की बारात, हम किसी से कम नही, अमर-अकबर-एंथोनी जैसी ना जाने कितनी फिल्मों के गीत आज भी रफी साहब की मीठी आवाज़ पाकर फिज़ाओ में गूंजते है। रफी साहब एक महान गायक तो थे ही साथ ही एक बहुत अच्छे इंसान भी थे मिलनसार, धीरे-धीरे बोलना, मंद-मंद मुस्कुराना लोगो की मदद करना ये रफी साहब की खास खूबी थी कई निर्माताओं के लिए रफी साहब ने मुफ्त में गीत गाए और एक पैसा भी नही लिया। रफी साहब पैसे के पीछे कभी नही भागे। इसीलिए पैसों की रॉयल्टी के लिए लता मंगेशकर रफी साहब से झगड़ पड़ी थी। रफी साहब का कहना था की हमको हमारे गाने का पैसा मिल गया अब गाने हिट हो या फ्लॉप हमे क्या करना। वहीं लताजी का कहना था की गानों के हिट होने के बाद गीतों की रॉयल्टी का पैसा गायकों को मिलना चाहिए। ये बात रफी साहब को नागवार गुज़री और रफी साहब ने लताजी से कह दिया कि आज के बाद में तुम्हारे साथ नही गाऊंगा। कई सालों तक रफी साहब और लताजी ने साथ नही गाया। फिर अभिनेत्री नरगिस जी की पहल पर और संगीतकार शंकर-जयकिशन के मनाने के बाद दोनों फ़िल्म प्रोफेसर में साथ गाने को राज़ी हुए। रफी साहब ने लताजी के साथ सबसे ज्यादा गीत गाए। इसके अलावा आशा भोंसले, शमशाद बेगम, नूरजहाँ, सुरैया, गीता दत्त, सुलक्षणा पंडित, सुमन कल्याणपुर, मुकेश, किशोर कुमार, तलत महमूद, महेंद्र कपूर, शैलेन्द्र सिंह, और मन्नाडे के साथ भी बेहतरीन गीत गाए है।

संगीत जगत में रफी साहब के अमूल्य योगदान के बावजूद भारत-सरकार ने उन्हें भारत-रत्न नही दिया ये समझ से परे है और ना ही कोई राष्ट्रीय अवार्ड सरकार ने मो. रफी के नाम से शुरू किया है ये सरकार का रफी साहब के साथ अन्याय है सरकार अपनी ये भूल सुधारे और रफी साहब को भारत-रत्न देकर उनको सच्ची श्रद्धाजंलि दे। बहरहाल रफी साहब आज हमारे बीच नही है लेकिन उनके गाए हुए गीतों के ज़रिए वो हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे। आज रफी साहब को इस दुनिया से गए 43 साल हो चुके है लेकिन उनके गीतों को सुनकर लगता ही नही है कि वो हमारे बीच मौजूद नही है ऐसे महान और अमर गायक को भारत सरकार भारत रत्न देकर सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करें हम तो बस इतना कहेंगे
*ना फ़नकार तुझसा तेरे बाद आया,*
*मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया...*


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