झाबुआ~संसार में आपत्ति-विपत्ति पूर्व भव के पाप के कारण आती है - प्रवर्तक पूज्य जिनेंद्र मुनि जी मसा~~

झाबुआ। 23 जुलाई, शनिवार को पूज्य जिनेंद्र मुनि जी मसा ने प्रवचन देते हुए फरमाया कि सम्यग दर्शन प्राप्त होने के बाद भी सम्यग दर्शन वापस भी चला जाता है, कोई निमित्त बन जाता है, जीव की श्रद्धा चली जाती है। अन्य आकर्षण देखकर जीव सम्यग दर्शन छोड़ देता है। उस ओर मुड़ जाता है, स्व धर्म को  रूखा समझने लगता है। चमत्कार के नाम पर व्यक्ति ठगा जाता है। किसी को फायदा हुआ है, यह जानकर व्यक्ति उस ओर जल्दी आकर्षित हो जाता है। हम जो भी आराधना करेंगे, उसका फल जरूर मिलेगा। जो भी अच्छा हो रहा है, वह अपने पुण्य के कारण हो रहा है। आराधना में कभी भी शंका-आशंका नहीं करना चाहिए। आज संसार में आपत्ति-विपत्ति अपने पूर्व भव के पाप उदय होने से आती है।



आराधना के प्रति दृढ़ विश्वास रखना चाहिए...............

व्यक्ति को आराधना के प्रति दृढ़ विश्वास रखना चाहिए, डिगना नहीं चाहिए। आराधना, डेढी, दुगुनी करने से अशुभ कर्म दूर होते है। व्यक्ति को विवके होना चाहिए कि उसे किस तरफ जाना चाहिए। 7 प्रकृतियों का क्षय करने पर आया हुआ सम्यक्त्व जाता नहीं है। जीव अरूपी है, वह दिखाई नहीं देता है। 6 द्रव्य धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, काल, जीवास्तिकाय है । जिसको तर्क से समझा नहीं सकते, उन पर विचार करना वह श्रृद्धा है, जो आत्मा निग्रंथ धर्म को जानता है, वह श्रृद्धावान बन जाता है। जमीकंद के एक जितने टुकड़े में अनंत जीव है । सुई की नोंक पर लगाते है, इसे मानना ही पडता है। आज व्यक्ति सुखी और दुखी है, तो उसके पुण्य और पाप के कारण। अनादिकाल से जीव है - जीतने जीव है वे उतने ही है, न घटते है न बढ़ते है। जीव अजर, अमर, अविनाशी है। आपने कहा कि प्रतिति हो जाने पर आत्मा को रूचि हो जाती है। पाप आश्रव छोड़ने योग्य है। संयम, तप मे रूचि होना रुचि भाव है। जिस आत्मा को श्रद्धा प्रतीति होती है, वह आराधना करना अच्छा समझता है। रूचि बढ़ने पर आत्मा आराधना की ओर बढ़ती है। आरंभ परिग्रह हेय है, विषय कषाय छोड़ने योग्य है। इनके कम होने पर जीव को सम्यकत्व की प्राप्ति होती है।




गुरु के मुख से प्रतिज्ञा लेना आवश्यक है
निग्रंथ प्रवचन धर्म अनुसार चलने की गुरु के समक्ष प्रतिज्ञा लेना चाहिए। प्रतिज्ञा का महत्व है, प्रतिज्ञा के बिना नियम, तप का कोई महत्व नहीं है। प्रतिज्ञा लेना ढोंग नहीं है, भगवान द्वारा बताई गई विधि है। तीर्थंकर भगवान के कोई गुरू नहीं थे, वे स्वयं प्रतिज्ञा लेते है। बिना प्रतिज्ञा करने पर मन बिगड़ जाता है। जिस प्रकार घर पर ताला लगाने पर धन सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार प्रतिज्ञा करने से जीव का व्रत रूपी धन सुरक्षित रहता है। मोक्ष मार्ग में प्रतिज्ञा का महत्व ज्यादा है। क्रोध में किया गया तप उल्टे कर्म बांधता है।


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