झाबुआ~प्रशस्त क्रिया के बिना मोक्ष की प्राप्ति अंसभव है- पूज्य जिनेन्द्र मुनिजी~~





विषय बुरे नही है विकार बुरे हेै -पूज्य संयत मुनिजी ~~

झाबुआ। शनिवार को स्थानक भवन में धर्मसभा में पूज्य जिनेन्द्र मुनिजी म.सा. ने फरमाया कि अनादि काल से जीव पाप क्रिया मे  प्रवृत्त है ।पांच प्रकार की इंद्रियों ने मन, वचन, काया द्वारा  पाप क्रिया की है । धीरे धीरे कर्म बांधते, भोगते  भोगते  एक समय ऐसा आता है जब जीव एकेन्द्रिय  से बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय,चउरेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय में आ जाता है, परन्तु पंचेन्द्रिय में भी जीव कभी कभी  ऐसे कर्म बांधता है कि वह वापस एकेन्द्रिय जीव बन जाता हे । हमें भगवान जिनेश्वर देव का  मार्ग मिला है, भगवान की वाणी सुनकर ज्ञान प्राप्त कर हेय को हेय समझ कर छोड़ना है तथा उपादेय को अपनाना हेै । शुभ भाव से मोक्ष मार्ग के अनुकुल की गई क्रिया प्रशस्त ,क्रिया  है । मन,वचन और काया से क्रिया होती हे । अक्रिया को जानना समझना आवश्यक है । अप्रशस्त क्रिया से कर्म का बंध होता है । ज्ञान के द्वारा जानकर अप्रशस्त क्रिया को मन,वचन और काया से छोडना चाहिये । मै अप्रशस्त क्रिया को छोड कर प्रशस्त किया को ग्रहण करूॅ,ऐसा संकल्प होना चाहिये । प्रशस्त क्रिया के बिना मोक्ष प्राप्ति असंभव हैे।

’विषयो के रागद्वेस दूर करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है’
पूज्य अणुवत्स संयतमुनिजी ने फरमाया कि भगवान महावीर स्वामी जी ने  छोडने योग्य, ओर  ग्रहण करने योग्य दोनो तरह  के उपदेश दिए है । भगवान का कोई स्वार्थ नही था, न ही किसी से बैर-भाव  था । भगवान ने जीव को कल्याण का मार्ग उसके हित के लिये बताया, उस मार्ग  पर चलेंगें तो कल्याण होगा, अन्यथा  संसार मे घुमते रहेगें । इन्द्रियो के विषय हेै वही संसार है, संसार हे वही  विषय है।  विषय भोगते है तो सुख प्रतीत होता है, जब उसके फल मिलते है, तो  जीव दुःखी होता है ।  विषयों में राग द्वेस जीव को दुःख पहूंचाते है, इनको दूर करने पर ही जीव सुखी होगा ।  कभी धन जोडता है तो लालच के कारण वापस चला जाता है ।जितना  हो उसमें संतोष करना चाहिये, जैसे जेैसे लाभ बढता है, वैसे वेसे लोभ बढता जाता है ।  इसलिए संतोष जरूरी हे ।  




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